प्रधान मंत्री श्री मोदी को खुला पत्र . राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार (RTI) के दायरे में लाने के पहल में एक भ्रष्टाचार विरोधी प्रधान मंत्री उदासीन क्यों?
आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी ,
यह खुला पत्र कल संसद में सूचना के अधिकार पर सांसदों के दृष्टिकोण और सरकारी प्रतिक्रिया से प्रेरित है .जनता के हाँथ में यह साधन, क्यों कर, जनता के ही प्रतिनिधियों को आंदोलित कर रहा है, चिंतनीय है .पत्र आपको प्रेषित है पर लक्ष सभी दल और नेता हैं . आप भारतीय राजनीती के सूर्य हैं जिसके प्रकाश में भारतीय लोकतंत्र, उसका सौन्दैर्य और उसकी कुरूपता दोनों ही आज प्रकाशित हैं.
भ्रष्ट आचार के खिलाफ युद्ध आपके राजनीतिक चिंतन का केंद्र बिंदु था और शायद अब भी है फिर सूचना के अधिकार के दायरे में राजनीतिक दलों को शामिल करना आपका दायित्व क्यों नहीं ? सत्य या मिथ्या ? पर एक पूर्व प्रधान मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति , मंत्री और वायुसेना प्रमुख पर लगे आरोप किस कसौटी पर कसे जाएँ की विषय का सत्य या उसका मिथ्यत्व स्थापित हो सके ? और अगर यह प्रश्न अनुतर्रित रह गया तो वर्तमान नेतृत्व कैसा आदर्श भावी पीढ़ियों के लिए प्रस्तुत कर पायेगा ? .क्या भावी पीढ़ियों द्वारा भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित करना ही उनके जीवन का लक्ष होगा ?
राष्ट्र का संविधान इसकी अव्धार्नाएं जनता की ही सहज बुद्धि का प्रतिबिम्ब है और सांसदों का आचरण इस सहज बुद्धि के आंकलन के दायरे से बाहर नहीं . पार्टियों के अपने अपने दृष्टिकोण और उन्हें स्थापित करने के हथकंडे हो सकते है पर राष्ट्रीय सहज बुद्धि और उसकी अन्तरात्मा की आवाज़ बिरले ही उन्हें धोखा दे सकती है . हाँ राजनीती नें आज परिदृश्य को गन्दला कर रखा है और इस गंद्लेपन को हटाने और सच्चाई तक पहुँचने का एक साधन सूचना का अधिकार ( (RTI) है जिसकी वंचना मिलीजुली भ्रष्ट राजनीतिक छलनीति, उसकी कुत्सित विचारधारा, लक्ष बन चूका है . संसद में इस अधिकार पर बहुदलीय आक्रमण और आपका मुस्कान भरा मौन कुछ अटपटा सा लगा . इस देश ने दो नरेंद्र देखे हैं दोनों विश्वपटल के अग्रणी नायक , वसुधैव कुटुंब के पक्षधर , एक ने विवेक में आनंद पाया दूसरा कब मन से आगे जायेगा ? विनोद लाजमी है पर कल एयर इंडिया यान खरीद फ़रोख्त मामले में प्रश्नों के घेरों में आ चुके इन महाशय ने पान और चायवालों का जिक्र जिस अंदाज़ में किया तब अनायास ही कांग्रेस की पतोंमुखी चिंतन शैली और उनके प्रवक्ताओं का फूहड़पन स्मृतिपटल पर उकर उठा , मणिशंकर याद आ गए , ये और बात है की जिन्होंने ऐसा आचरण किया वो कांग्रेस से नहीं थे पर उनके दल की जड़ें भी उसी सामंती सोच में है जिस पर जूते बरस रहे हैं फिर भी वाणी में सैंयम नहीं.
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के वक्तव्य की गंभीरता को समझना जरूरी है . जब अर्थव्यवस्था में काले धन का संचार होता है तो इसके नागरिकों के लिए गंभीर परिणाम होते हैं. बढती मंहगाई और सरकारी सेवाओं में सामंजस्य स्थापित करने का एक साधन महंगाई भत्ता हो सकता है, पर उनकी दशा सोचें, जिन्हें महंगाई भत्ता मिलता नहीं पर बढती कीमतों का कोपभाजन बनना पड़ता है.
अर्थव्यवस्था में जितना काला धन और जितनी तेजी से इसका संचार हो रहा है उसका आम आदमी के जीवन पर विभीषिका सा असर है जिसपर काबू पाने की चेष्टा से आप सभी कतराते नजर आतें हैं. इस काले धन का बहुत बड़ा भाग और उसका उपयोग राजनीत में ही है जिसके खजाने को सूचना के अधिकार से बाहर रखा गया हैं जो प्रजा के साथ धोखा है . इन खजानों को भरने वाले वे धन कुबेर हैं जिनकी अपेक्षाएं हमारी योजनाओं में झलकती हैं. कृषक, मजदूर और गरीब इन योजनाओं में कुछ उसी तरह शामिल हो पातें हैं जैसे होटल में वेटर जिन्हें धनाढय टिप दिया करते हैं और जिन्हें नेता वर्ष में एक बार पहली मई को याद करते हैं . बाकी समय वो अपने बटते जाते , सूखे खेतों को छोड़ शहरों में गरीबों के बीच अछूत बस्तियों में बसते, श्रमिकों के बाज़ार में नीलाम होते नज़र आते हैं.
भारतीय राजनीत में चौथी बार ऐसा मौका आया है जब राष्ट्र ने एक इमानदार प्रधान मंत्री पाया है . लाल बहादुर , अटल बिहारी और मनमोहन के बाद राष्ट्र ने आप के रूप में एक इमानदार प्रधानमंत्री पाया है . अटल बिहारी और मनमोहन जी के साथ बहुमत के नहीं होने की विवशता थी पर आपके साथ तो ऐसा नहीं फिर आपके द्वारा इस विषय में पहल क्यों नहीं ? राजनीत और इसका स्वार्थी आर्थिक पोषण जो अब देश में बढ़ते भ्रष्टाचार का मूल आधार बन चुका है उस पर पर प्रकाश डालने से आज की सत्ता का सूर्य कतरा रहा क्यों ? किसने लगा रखा है इस ग्रहण को ?
जनता को, लोकतंत्र में, उसके इस महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित करने की किसी भी चेष्टा का विरोध अवश्यम्भावी है , राजनीत से भ्रष्ट आचरण को दूर करने के लिए किसी आकाशपुष्प की जरूरत नहीं जिसे अन्ना ढूंढना चाहते थे पर ढूंढ नहीं पाए , जरूरत है सही नीयत और इच्छाशक्ति की जिसकी आप में कमी नहीं. अगर आपके नेतृत्व में राष्ट्र ने यह मौका गँवा दिया तो इससे राष्ट्र का अनिष्ट ही होगा. अगर आपने राष्ट्र हित में पहल किया तो आपके ऐसे आग्रह के विरोधी यथार्थ के आईने में देखे जायेंगे और भ्रष्टाचारियों के समूह में दिखेंगे. क्या राष्ट्र आपसे अलग दिखने की अपेक्षा कर सकता है ?
रामकृष्ण परमहंस से किसी ने पूछा, कलियुग में तपस्या का स्वरुप क्या होगा ? परमहंस ने कहा कलियुग में “ सत्य “ ही तपस्या होगी जिसका अनुसरण कर पाना ही तप होगा. सत्य का ज्ञान नागरिक का अधिकार है और आध्यात्म का लक्ष भी फिर कोई कैसे उसे इस अधिकार से वंचित रखने की चेष्टा करने की जुर्रत कर सकता है ? और आप ऐसी चेष्टा के विरोध में हमारे साथ क्यों नहीं ?
यह पत्र आप तक पहुंचे न पहुंचे , कोई पढ़े न पढ़े पर यह नागरिक अपने आग्रह को जारी रखने का वचन देता है , फैलते अन्धकार में छोटे छोटे दीप जलाकर सत्य की तालाश करता रहेगा तब तक, जब तक आप, भ्रष्टाचारियों से अलग खुद को स्थापित नहीं कर देतें और ऐसा आप तभी कर पायेंगे जब राजनीतिक दल और उनकी सम्पदा की जानकारी सूचना के अधिकार के दायरे में लाने इमानदार चेष्टा प्रदर्शित कर सकेंगे.
आदरणीय श्री नरेंद्र मोदी जी ,
यह खुला पत्र कल संसद में सूचना के अधिकार पर सांसदों के दृष्टिकोण और सरकारी प्रतिक्रिया से प्रेरित है .जनता के हाँथ में यह साधन, क्यों कर, जनता के ही प्रतिनिधियों को आंदोलित कर रहा है, चिंतनीय है .पत्र आपको प्रेषित है पर लक्ष सभी दल और नेता हैं . आप भारतीय राजनीती के सूर्य हैं जिसके प्रकाश में भारतीय लोकतंत्र, उसका सौन्दैर्य और उसकी कुरूपता दोनों ही आज प्रकाशित हैं.
भ्रष्ट आचार के खिलाफ युद्ध आपके राजनीतिक चिंतन का केंद्र बिंदु था और शायद अब भी है फिर सूचना के अधिकार के दायरे में राजनीतिक दलों को शामिल करना आपका दायित्व क्यों नहीं ? सत्य या मिथ्या ? पर एक पूर्व प्रधान मंत्री और वर्तमान राष्ट्रपति , मंत्री और वायुसेना प्रमुख पर लगे आरोप किस कसौटी पर कसे जाएँ की विषय का सत्य या उसका मिथ्यत्व स्थापित हो सके ? और अगर यह प्रश्न अनुतर्रित रह गया तो वर्तमान नेतृत्व कैसा आदर्श भावी पीढ़ियों के लिए प्रस्तुत कर पायेगा ? .क्या भावी पीढ़ियों द्वारा भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान स्थापित करना ही उनके जीवन का लक्ष होगा ?
राष्ट्र का संविधान इसकी अव्धार्नाएं जनता की ही सहज बुद्धि का प्रतिबिम्ब है और सांसदों का आचरण इस सहज बुद्धि के आंकलन के दायरे से बाहर नहीं . पार्टियों के अपने अपने दृष्टिकोण और उन्हें स्थापित करने के हथकंडे हो सकते है पर राष्ट्रीय सहज बुद्धि और उसकी अन्तरात्मा की आवाज़ बिरले ही उन्हें धोखा दे सकती है . हाँ राजनीती नें आज परिदृश्य को गन्दला कर रखा है और इस गंद्लेपन को हटाने और सच्चाई तक पहुँचने का एक साधन सूचना का अधिकार ( (RTI) है जिसकी वंचना मिलीजुली भ्रष्ट राजनीतिक छलनीति, उसकी कुत्सित विचारधारा, लक्ष बन चूका है . संसद में इस अधिकार पर बहुदलीय आक्रमण और आपका मुस्कान भरा मौन कुछ अटपटा सा लगा . इस देश ने दो नरेंद्र देखे हैं दोनों विश्वपटल के अग्रणी नायक , वसुधैव कुटुंब के पक्षधर , एक ने विवेक में आनंद पाया दूसरा कब मन से आगे जायेगा ? विनोद लाजमी है पर कल एयर इंडिया यान खरीद फ़रोख्त मामले में प्रश्नों के घेरों में आ चुके इन महाशय ने पान और चायवालों का जिक्र जिस अंदाज़ में किया तब अनायास ही कांग्रेस की पतोंमुखी चिंतन शैली और उनके प्रवक्ताओं का फूहड़पन स्मृतिपटल पर उकर उठा , मणिशंकर याद आ गए , ये और बात है की जिन्होंने ऐसा आचरण किया वो कांग्रेस से नहीं थे पर उनके दल की जड़ें भी उसी सामंती सोच में है जिस पर जूते बरस रहे हैं फिर भी वाणी में सैंयम नहीं.
भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के वक्तव्य की गंभीरता को समझना जरूरी है . जब अर्थव्यवस्था में काले धन का संचार होता है तो इसके नागरिकों के लिए गंभीर परिणाम होते हैं. बढती मंहगाई और सरकारी सेवाओं में सामंजस्य स्थापित करने का एक साधन महंगाई भत्ता हो सकता है, पर उनकी दशा सोचें, जिन्हें महंगाई भत्ता मिलता नहीं पर बढती कीमतों का कोपभाजन बनना पड़ता है.
अर्थव्यवस्था में जितना काला धन और जितनी तेजी से इसका संचार हो रहा है उसका आम आदमी के जीवन पर विभीषिका सा असर है जिसपर काबू पाने की चेष्टा से आप सभी कतराते नजर आतें हैं. इस काले धन का बहुत बड़ा भाग और उसका उपयोग राजनीत में ही है जिसके खजाने को सूचना के अधिकार से बाहर रखा गया हैं जो प्रजा के साथ धोखा है . इन खजानों को भरने वाले वे धन कुबेर हैं जिनकी अपेक्षाएं हमारी योजनाओं में झलकती हैं. कृषक, मजदूर और गरीब इन योजनाओं में कुछ उसी तरह शामिल हो पातें हैं जैसे होटल में वेटर जिन्हें धनाढय टिप दिया करते हैं और जिन्हें नेता वर्ष में एक बार पहली मई को याद करते हैं . बाकी समय वो अपने बटते जाते , सूखे खेतों को छोड़ शहरों में गरीबों के बीच अछूत बस्तियों में बसते, श्रमिकों के बाज़ार में नीलाम होते नज़र आते हैं.
भारतीय राजनीत में चौथी बार ऐसा मौका आया है जब राष्ट्र ने एक इमानदार प्रधान मंत्री पाया है . लाल बहादुर , अटल बिहारी और मनमोहन के बाद राष्ट्र ने आप के रूप में एक इमानदार प्रधानमंत्री पाया है . अटल बिहारी और मनमोहन जी के साथ बहुमत के नहीं होने की विवशता थी पर आपके साथ तो ऐसा नहीं फिर आपके द्वारा इस विषय में पहल क्यों नहीं ? राजनीत और इसका स्वार्थी आर्थिक पोषण जो अब देश में बढ़ते भ्रष्टाचार का मूल आधार बन चुका है उस पर पर प्रकाश डालने से आज की सत्ता का सूर्य कतरा रहा क्यों ? किसने लगा रखा है इस ग्रहण को ?
जनता को, लोकतंत्र में, उसके इस महत्वपूर्ण अधिकार से वंचित करने की किसी भी चेष्टा का विरोध अवश्यम्भावी है , राजनीत से भ्रष्ट आचरण को दूर करने के लिए किसी आकाशपुष्प की जरूरत नहीं जिसे अन्ना ढूंढना चाहते थे पर ढूंढ नहीं पाए , जरूरत है सही नीयत और इच्छाशक्ति की जिसकी आप में कमी नहीं. अगर आपके नेतृत्व में राष्ट्र ने यह मौका गँवा दिया तो इससे राष्ट्र का अनिष्ट ही होगा. अगर आपने राष्ट्र हित में पहल किया तो आपके ऐसे आग्रह के विरोधी यथार्थ के आईने में देखे जायेंगे और भ्रष्टाचारियों के समूह में दिखेंगे. क्या राष्ट्र आपसे अलग दिखने की अपेक्षा कर सकता है ?
रामकृष्ण परमहंस से किसी ने पूछा, कलियुग में तपस्या का स्वरुप क्या होगा ? परमहंस ने कहा कलियुग में “ सत्य “ ही तपस्या होगी जिसका अनुसरण कर पाना ही तप होगा. सत्य का ज्ञान नागरिक का अधिकार है और आध्यात्म का लक्ष भी फिर कोई कैसे उसे इस अधिकार से वंचित रखने की चेष्टा करने की जुर्रत कर सकता है ? और आप ऐसी चेष्टा के विरोध में हमारे साथ क्यों नहीं ?
यह पत्र आप तक पहुंचे न पहुंचे , कोई पढ़े न पढ़े पर यह नागरिक अपने आग्रह को जारी रखने का वचन देता है , फैलते अन्धकार में छोटे छोटे दीप जलाकर सत्य की तालाश करता रहेगा तब तक, जब तक आप, भ्रष्टाचारियों से अलग खुद को स्थापित नहीं कर देतें और ऐसा आप तभी कर पायेंगे जब राजनीतिक दल और उनकी सम्पदा की जानकारी सूचना के अधिकार के दायरे में लाने इमानदार चेष्टा प्रदर्शित कर सकेंगे.
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