कांग्रेस मुक्त भारत ? एक अतिशयोक्ति (4) .
इस घड़ी में कांग्रेसियों की समझ से धर्म का
परिभाषित होना जरूरी है. प्रकृति अनवरत अनुशासित क्रियाशीलता में लीन है.सूर्य का
समय से उगना और अस्त होना, ऋतुओं का लयबद्ध तरीके से कर्मशील होना , चाँद का उगना
और अस्त होना इनके स्वधर्मो के संकेत हैं . कोई भी चीज अपनी वस्तुता, अपनी अस्तित्व से जानी जाती है सूर्य की वस्तुता उसकी रौशनी
में है, अग्नि की उसकी उष्णता में, जल की
उसके आद्रता में ,यही इनके धर्म है फिर मानवता का धर्म क्यों नहीं?
जब
प्रकृति ही जीव जीव के बीच समभाव है और हर धर्म का नज़रिया इनके प्रति एक सा है तो
फिर मानव मानव के बीच समभाव और सहिष्णुता क्यूँ नहीं ?
अगर
सहस्त्रों वर्षों से प्रकृति ने अपने
अनुशासित क्रियाशीलता के धर्म को भंग नहीं होने दिया तो भिन्न भिन्न
धर्मावलम्बियों में टकराव कराना किस
धर्म का प्रचार है , यह तो शुद्ध अधर्म है
? चुनाव जीते हारे जा सकते हैं हा पर
क्या चुनाव हारना अपने शुद्ध आत्म स्वरुप “ वसुधैव कुटुम्बकम “ में आस्था
को बचाए रखने की कोई बड़ी कीमत है?
हमें
गर्व है हम भी हिन्दू हैं इस लिए की हम जानते है की वो जो धर्मो में टकराव पैदा
करते हैं उन्हें अभी अज्ञान के आवरण को उतारना बाकी है . वह आवरण जिसने उन्हें
भ्रमित कर रखा है. एक भ्रमित नेतृत्व जनमानस को भ्रमित कर राष्ट्र की अखंडता को ही
चुनौती दे बैठता हैं. जिसमे मानवता नहीं
वह धर्मच्युत है वह किसी भी धर्म की
दृष्टि से धार्मिक नहीं. हमारे उपनिषदों का सार भागवद के अठारह अध्यायों
में निहित है , भक्ति , कर्म और ज्ञान ,ये तीनों मार्ग मानव को उसके शुद्ध स्वरुप
तक पहुँचने के मार्ग हैं उस अनुभूति की, जिस पर विश्व एक समुदाय , “वसुधैव
कुटुम्बकम” आधारित है. पर आप अपने
इन्द्रियों के वशीभूत बुद्धि से वियुक्त
हुए जाते हैं . न आप अपने अन्तः में
कुरुक्क्षेत्र को देख पाए , न अपने गुनी पांडवों से युक्त होने की चेष्टा ही की .
कौरवों की असुरी प्रवृतियों के चकाचौंध ने
आपको अपने वश में कर डाला. आप शुद्ध मानव धर्म से अयुक्त अपने अहंकार, अपनी
आसक्तियों और उनसे पोषित आचरण से अभिभूत हो उठे . आपने धृतराष्ट्र के सामान कुछ संकीर्ण अधर्माव्लाम्बियों के आचरण पर मौन धारण किये रखना ही उचित
समझा. आखिर कैसे अक्षुण रख पाएंगे
आप पटेल के इस भव्य भारत को जिनकी
गगनचुम्बी मूरत की बात तो आप करते हैं पर राष्ट्र और उसकी अखंडता को ही
अदूर्दार्शिता वश खतरे में डाल रहे हैं.?
पंजाब नशीले पदार्थों की गुलामी में जकड़ता जा रहा है , कशमीर में राष्ट्रीय ध्वज
लहराते, बच्चे पिटते हैं और मिली जुली सरकार की विवशता में आप मौन रहते हैं. जागिये !
हम जो सच्चे कांग्रेसी हैं पहले अपनी कमजोरियों
और गलतियों को स्वीकारेंगे क्योंकि हम गाँधी के सत्य के आग्रह पर आस्था रखने वाले
हैं. हम मानते हैं की हममे भटकाव आ गया है . हम
में जो त्रुटियाँ रहीं उन्हें हमें पिछले चुनावों के आईने में देख लिया , जब आपने
सोशल मीडिया पर झूठों का अम्बार लगा लगा
दिया तो हमने मिथ्या का सामना मिथ्या से नहीं किया . जनता समझ गयी की आपकी चाय
की व्यवस्था एक सुनियोजित अल्पकालीन व्यवस्था थी जो आप चुनाव जीतने के
बाद परोसना भूल गए . आपका पंद्रह लाख
रूपये का अतिशयोक्त वादा जनता के आपके ऊपर विश्वास और उनके निश्चलता के साथ मात्र एक जुमले का उपयोग नहीं एक आदर्श विहीन भौंडा मज़ाक था .शनैः शनैः आपके झूठ का लिबास
उतरने लगा और आपके झूठ उन छोटे छोटे दीपों की रौशनी में दिखने लगे हैं उसी सोशल मीडिया
पर जो आपकी सेना ने अपहृत कर रखा था एक मिथ्या
धाराप्रवाह के प्रवाह के लिए. अब जनता कहे
सुने पर अपने कान के लिए कौवे का पीछा नहीं करती. वहः पहले अपने कान को उसकी
अपनी जगह पर ढूंढती है . किसी ने खूब
फरमाया आपके ही लोगों ने सोशल मीडिया पर
इतनी गंदगी फैला दी है जिसकी सफाई अब आपके
ही स्वछता अभियान के परे है. क्या और कहाँ
गंदगी है और क्या क्या स्वच्छ और कहाँ स्वछता इसकी पहचान तो आम आदमी को है और इसे उन्हें आपकी
मन की बातों से ही तो ज्ञात नहीं होगा , उनका भी अपना विवेक है ,वे इतने गरीब तो
नहीं. गंगा कुछ आपके और कुछ हमारे वजह से बहुत ही गन्दी हो गयी इतनी की आपकी ही प्रभारी मंत्री
ने कल एक प्रेस साक्षात्कार में अपने हाँथ उठा दिए .
स्वछता
नेतृत्व द्वारा स्थापित आदर्शों से
प्रेरित होती है . सिर्फ प्रवाह में गंदगी को ढूंढना और और इंगित करना ही समस्या
का हल नहीं ,आदर्श आचरण और विचारों से आदर्श लोक आचरण स्थापित होतें है और इस सन्दर्भ में हम
कांग्रेसी आप पर ऊँगली नहीं उठा सकते, गिरते
लोकाचार के लिए शायद हम आपसे भी ज्यादा जिम्मेवार हैं . आवशयकता है अन्तः जागरण की
, अन्तः की आवाज़ सुनने की ,प्रवाह को छोड प्रवाहों के उद्गम स्थानों को ढूँढने की
. मनमोहन जी में वह करिश्मा शायद नहीं थी की वो राजनीति, और गंठजोड़ से आगे जा उस भ्रष्टाचार के स्रोत , उद्गम स्थली पर प्रहार कर
पाते जो भ्रष्टाचार की जननी है , राजनीतिक दलों के चंदे के स्रोत , उनके दाता जो
हर्षद मेहता की ही तरह आर्थिक व्यवस्था को अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए तहस नहस कर बैठते हैं,
राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों में दखलंदाजी करते हैं और एक दूरदर्शी भारतीय रिज़र्व बैंक
के अध्यक्ष को हटाने की दांव पेंच में लग जाते हैं . अगर भ्रष्टाचार हटाना आपके
राजनीती की धुरी थी तो क्यों नहीं लाते आप
राजनीतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार R
T I के
दायरे में ताकि हम कांग्रेसी भी अपने
कुकृत्यों से अलंकृत हो पाते और विवश हो
पाते इनसे बाहर निकलने को . क्या एक दूसरे पर सिर्फ दोषारोपण ही इस समस्या का हल
है या फिर एक सार्थक , शाश्वत प्रयास की
आवशयकता जो R T I से
संभव है .
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