कांग्रेस मुक्त भारत ? एक अतिशयोक्ति.(1)
क्या कांग्रेस को दफन करने का समय आ चुका है ? क्या यह निष्प्रयोजन हो चुकी है ? क्या बदलते सामाजिक परिवेश में इसकी सार्थकता विलीन हो चुकी है? क्या राष्ट्रीय चिंतन के सनातन वैचारिक आन्दोलन को स्मृति पटल से मिटा पाना इतना सरल होगा? आज वसुंधरा दूब विहीन है पर बारिशों का इंतज़ार करें वह फिर से हरी होगी हाँ इस बार दूबों में मोथे नहीं होंगे . कहना की देश कांग्रेस को भूल पायेगा वैसा ही है मानों धरती दूब विहीन रहेगी. भारतीय राजनीतिक चिंतन में कांग्रेस वह दूब है जो मोथों से ढक गयी है, मोथे हटेंगे और भारत माता और उसको समर्पित राजनीत नए दूबों के सौन्दैर्य से अलंकृत, खिलखिला उठेगी . प्रकृति उदास है, दुर्भिक्ष का माहौल है , चारों ओर महामारी है , कभी चोरों में मौसेरे हैं तो कभी मौसेरों में चोर परिवार के आधे पांडवों में हैं तो आधे कौरवों में, राष्ट्र किंकर्तव्यविमूढ है. भारतीय राजनीत पूर्णरूपेण फॅमिली बिज़नेस है और इसके पोषक कभी इधर से तो कभी उधर से. .
देश दाना पानी मांगता है , युवा रोजगार तलाशते हैं . भूखे , प्यासे आत्महत्या पर आमादा किसानों को नसीब है कभी मंदिर , कभी इशरत, कभी औगास्ता तो कभी मोदी की डिग्रियां. अब तो संसद भी चाय पर अविवेकशील चर्चा का अड्डा बन चुका है जिसकी प्रासंगिकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगता जाता है. .
क्या कांग्रेस पंडित नेहरु की थी ? क्या यह लाल बहादुर शास्त्री की थी ? क्या यह इंदिरा की थी ? क्या यह राजीव ,नाराशिम्हा राव, मनमोहन सिंह या सोनिया, प्रियंका या राहुल की है ? क्या राष्ट्र की सबसे सनातन राजनीतिक अभिव्यक्ति कांग्रेस किसी व्यक्ति विशेष की निज अमानत हो सकती है और क्या ऐसा सोचना , ऐसा कहना , ऐसा होना या ऐसा होने की इज़ाज़त देना उचित है ? विचारधारा पर खुद मुख्तारी लोकतंत्र की अव्धार्नाओं, उसकी वस्तुता का उल्लंघन है.
क्या कांग्रेस का इतिहास इसके कुछ गिने चुने लोगों से ही जाना और समझा जा सकता है या की उसकी राष्ट्रीय प्रासंगिकता जांचने के लिए राष्ट्रीय स्मृतिपटल पर अंकित स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को पूर्ण रूप से खंघालने की विवेकपूर्ण आवश्यकता है? क्या राष्ट्रीय चेतना की इस राष्ट्रीय राजनीतिक धरोहर को कुछ चापलूस विवेकशून्य मूढ़ मतियों की अनुकम्पा पर आश्रित छोड़ा जा सकता है या सिर्फ खोखली हठधर्मी आलोचना का शिकार होने दिया जा सकता ?
भावनात्मक कसौटी पर लोक सद्भावना और सहानुभूति गाँधी परिवार के सदस्यों के साथ बनी रहेगी , उनके नेतृत्व औचित्य और उपयोगिता पर एक कांग्रेसी के ह्रदय में उठते प्रश्न पर शायद कुछ कान्ग्रेसिओं और समाज का उचित प्रतिवाद भी हो, पर क्या उठते प्रश्नों के उत्तर मात्र भावनात्मक और सामाजिक दृष्टिकोणों पर अवलंबित किये जा सकते है या इनका उत्तर पाने का मार्ग सम्भाव में स्थित बिना द्वेष राग के विवेकपूर्ण विश्लेषण से संभव है ?
आजादी से कोई छह दशक पूर्व जिस चेतना की अभिव्यक्ति एक संघठन, कांग्रेस के रूप में हुई उसका लक्ष था देश की स्वतंत्रता. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन और कांग्रेसी चेतना और चिंतन एक दूसरे से युक्त रहे. बापू ने सत्य को पहचाना. यह सत्य क्या था ? और इस सत्य के आग्रह को और राष्ट्रीय चेतना को अनेक विघ्नों के बावजूद अहिंसा के रास्ते उसके दिव्य लक्ष ,देश की स्वाधीनता तक पहुँचाया. गाँधी ने पूर्ण समर्पण और इश्वर अर्पण की भावना से एक दिव्य लक्ष को चुना, अपने व्यक्तित्व में आमूल परिवर्तन किये ,एक पीड़ित जनभावना के अनुकूल विदेशी वस्त्रों को त्याग एक फ़कीर के वस्त्र को धारण किया. स्वार्थी आसक्तियों को त्याग अनासक्त भाव से कर्ताबोध बगैर कर्मण्यता को लक्ष बना एक अनुसरणीय एवम अनुकरणीय नेतृत्व का दर्शन कराया और इस तरह एक दिव्य लक्ष से अनुप्राणित स्वतंत्रता संग्रामियों से उनका एकाकार हुआ. ऐसे दिव्य नेतृत्व और उसके दिव्य लक्ष की प्राप्ति, जन अभिलाषा और जन कर्तव्य बन गया. वो बोलते थे तो राष्ट्र चलता था और उनके आग्रह पर तेज बहती राष्ट्रीय चेतना को विराम भी लग जाता था.
पर क्या सब गांधी हो सकते थे ? गांधी पूर्णत्व को प्राप्त एक ऐसे संत थे जो खुद को भली भांति समझ पाए थे और मानव धर्म को भली भांति समझ सके थे. वो भली भांति जानते थे की कर्म में ही उनका और उनके अनुयाइयों का अधिकार था और कर्मण्यता के लिए जरूरत रही एक दिव्य लक्ष की . जंजीरों में जकड़ी जननी की स्वाधीनता ही उनका दिव्य लक्ष रहा और इसकी प्राप्ति वो धनसंग्रह से नहीं अपितु लोकसंग्रह से कर पाए. स्वाधीनता संग्राम में बापू को विदेश में सिले वस्त्रों को पहनने की जरूरत नहीं पड़ी , धन संग्रह के प्रति वे अनासक्त रहे. उनको देख आवाम ने विदेशी उत्पादों को अपने जीवन से बहिष्कृत कर दिया. इस तरह बापू ने सर्व प्रथम “ मेक इन इंडिया “ का आव्हान किया. चरखे के सहारे बर्तानी कपडा मिलों को झगझोर दिया. इसके लिए न तो बापू को दस लाख के सूट को पहनने की आवशयकता पड़ी और न ही लोक निंदा से बचने के लिए बाद में इसके नीलामी की आवशयकता. बापू जैसे नेता की दिव्यता और उनका व्यक्तित्व सार्वभौम और सर्वगत ही हो सकता था. उन्होंने तो इश्वर और अल्लाह को एक बताया था और इनसे सिर्फ सबके लिए सम्मति के आशीष का आग्रह किया था. बापू और गोडसे दोनों ही गीता को पढने वाले थे. बापू ने गीता के सार को समझा , धर्म की परिभाषा समझी और मृत्यु पर्यंत इसका अनुसरण किया. उन्होंने गीता को समझा , अल्लाह को जाना , गुरुग्रंथ साहिब की सत्यता को जाना और ईसा समान अपने प्रियजनों के लिए सूली पर चढ़ने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई.
गोडसे गीता को नहीं समझ सके मानव धर्म को नहीं समझ पाए और अज्ञानवश एक दुष्कृत के आग्रही बने. गोडसे ही नहीं बहुत से मिथ्या धर्मावलम्बियों ने मानव धर्म को समझने में भूल की और पशुवत वृतियों के आग्रही बनते चले गए. अगर उन्होंने अपने अपने स्वधर्म को समझ पाया होता तो वे भारत माता के सपूत, उसके भक्त, उसकी भक्ति और उसके आग्रहों के हन्ता नहीं बनते. कांग्रेस का चिंतन बापू की चेतना की ही अभिव्यक्ति थी. पर देवत्व को सब तो प्राप्त नहीं हो सकते थे इसलिए सबको उस दिव्य धारा का भाग बनना ही था . वो जो देवत्व को प्राप्त होते हैं ,सबको उपलब्ध रहते हैं. राष्ट्र उनको राष्ट्रपिता मानता है और चीन जैसे राष्ट्र के राष्ट्रपति को सर्वप्रथम साबरमती ले जाने का औचित्य गाँधी विरोधियों को भी विवश कर पड़ता है. ..........क्रमशः .......................क्या कांग्रेस पंडित नेहरु की थी ? क्या यह लाल बहादुर शास्त्री की थी ? क्या यह इंदिरा की थी ? क्या यह राजीव ,नाराशिम्हा राव, मनमोहन सिंह या सोनिया, प्रियंका या राहुल की है ? क्या राष्ट्र की सबसे सनातन राजनीतिक अभिव्यक्ति कांग्रेस किसी व्यक्ति विशेष की निज अमानत हो सकती है और क्या ऐसा सोचना , ऐसा कहना , ऐसा होना या ऐसा होने की इज़ाज़त देना उचित है ? विचारधारा पर खुद मुख्तारी लोकतंत्र की अव्धार्नाओं, उसकी वस्तुता का उल्लंघन है.
क्या कांग्रेस का इतिहास इसके कुछ गिने चुने लोगों से ही जाना और समझा जा सकता है या की उसकी राष्ट्रीय प्रासंगिकता जांचने के लिए राष्ट्रीय स्मृतिपटल पर अंकित स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को पूर्ण रूप से खंघालने की विवेकपूर्ण आवश्यकता है? क्या राष्ट्रीय चेतना की इस राष्ट्रीय राजनीतिक धरोहर को कुछ चापलूस विवेकशून्य मूढ़ मतियों की अनुकम्पा पर आश्रित छोड़ा जा सकता है या सिर्फ खोखली हठधर्मी आलोचना का शिकार होने दिया जा सकता ?
भावनात्मक कसौटी पर लोक सद्भावना और सहानुभूति गाँधी परिवार के सदस्यों के साथ बनी रहेगी , उनके नेतृत्व औचित्य और उपयोगिता पर एक कांग्रेसी के ह्रदय में उठते प्रश्न पर शायद कुछ कान्ग्रेसिओं और समाज का उचित प्रतिवाद भी हो, पर क्या उठते प्रश्नों के उत्तर मात्र भावनात्मक और सामाजिक दृष्टिकोणों पर अवलंबित किये जा सकते है या इनका उत्तर पाने का मार्ग सम्भाव में स्थित बिना द्वेष राग के विवेकपूर्ण विश्लेषण से संभव है ?
आजादी से कोई छह दशक पूर्व जिस चेतना की अभिव्यक्ति एक संघठन, कांग्रेस के रूप में हुई उसका लक्ष था देश की स्वतंत्रता. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन और कांग्रेसी चेतना और चिंतन एक दूसरे से युक्त रहे. बापू ने सत्य को पहचाना. यह सत्य क्या था ? और इस सत्य के आग्रह को और राष्ट्रीय चेतना को अनेक विघ्नों के बावजूद अहिंसा के रास्ते उसके दिव्य लक्ष ,देश की स्वाधीनता तक पहुँचाया. गाँधी ने पूर्ण समर्पण और इश्वर अर्पण की भावना से एक दिव्य लक्ष को चुना, अपने व्यक्तित्व में आमूल परिवर्तन किये ,एक पीड़ित जनभावना के अनुकूल विदेशी वस्त्रों को त्याग एक फ़कीर के वस्त्र को धारण किया. स्वार्थी आसक्तियों को त्याग अनासक्त भाव से कर्ताबोध बगैर कर्मण्यता को लक्ष बना एक अनुसरणीय एवम अनुकरणीय नेतृत्व का दर्शन कराया और इस तरह एक दिव्य लक्ष से अनुप्राणित स्वतंत्रता संग्रामियों से उनका एकाकार हुआ. ऐसे दिव्य नेतृत्व और उसके दिव्य लक्ष की प्राप्ति, जन अभिलाषा और जन कर्तव्य बन गया. वो बोलते थे तो राष्ट्र चलता था और उनके आग्रह पर तेज बहती राष्ट्रीय चेतना को विराम भी लग जाता था.
पर क्या सब गांधी हो सकते थे ? गांधी पूर्णत्व को प्राप्त एक ऐसे संत थे जो खुद को भली भांति समझ पाए थे और मानव धर्म को भली भांति समझ सके थे. वो भली भांति जानते थे की कर्म में ही उनका और उनके अनुयाइयों का अधिकार था और कर्मण्यता के लिए जरूरत रही एक दिव्य लक्ष की . जंजीरों में जकड़ी जननी की स्वाधीनता ही उनका दिव्य लक्ष रहा और इसकी प्राप्ति वो धनसंग्रह से नहीं अपितु लोकसंग्रह से कर पाए. स्वाधीनता संग्राम में बापू को विदेश में सिले वस्त्रों को पहनने की जरूरत नहीं पड़ी , धन संग्रह के प्रति वे अनासक्त रहे. उनको देख आवाम ने विदेशी उत्पादों को अपने जीवन से बहिष्कृत कर दिया. इस तरह बापू ने सर्व प्रथम “ मेक इन इंडिया “ का आव्हान किया. चरखे के सहारे बर्तानी कपडा मिलों को झगझोर दिया. इसके लिए न तो बापू को दस लाख के सूट को पहनने की आवशयकता पड़ी और न ही लोक निंदा से बचने के लिए बाद में इसके नीलामी की आवशयकता. बापू जैसे नेता की दिव्यता और उनका व्यक्तित्व सार्वभौम और सर्वगत ही हो सकता था. उन्होंने तो इश्वर और अल्लाह को एक बताया था और इनसे सिर्फ सबके लिए सम्मति के आशीष का आग्रह किया था. बापू और गोडसे दोनों ही गीता को पढने वाले थे. बापू ने गीता के सार को समझा , धर्म की परिभाषा समझी और मृत्यु पर्यंत इसका अनुसरण किया. उन्होंने गीता को समझा , अल्लाह को जाना , गुरुग्रंथ साहिब की सत्यता को जाना और ईसा समान अपने प्रियजनों के लिए सूली पर चढ़ने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई.
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