पाक युद्ध बंदी ........... मानवीय भावना
और राष्ट्रीय दायित्व में चुनाव
युद्ध समाप्त हो चुका था
और पाकिस्तान का एक हिस्सा उससे अलग बांगलादेश के रूप में आज़ाद हो चूका था .
हजारों हज़ार की संख्या में पाक युद्ध बंदी सरहद के इस पार अपने प्रियजनों से दूर
अपने वतन वापसी की संभावनाएं तलाश रहे थे, कुछ एक भागने की भी कोशिश कर बैठते थे
और जब पकड़ से दूर होने लगते थे तो उन्हें बन्दूक की गोलियां ढूंढ लिया करती थीं .
जिनेवा कन्वेंशन के अंतर्गत इन युद्ध बंदियों को सारी सुविधायें प्राप्त थी पर
काटों से घिरे , फौजियों से सुरक्षित और श्वान दस्तों के बीच भागने की कोशिशें जारी रहती थीं.
ऐसा ही एक बंदी शिविर झारखण्ड की राजधानी रांची के करीब नामकुम में
स्थापित था , जिसमे कैद थे एक बहुत बड़ी
तादाद में पाकिस्तानी युद्ध बंदी, अपनी खैरियत
का पैगाम, आल इंडिया रेडियो की उर्दू सेवा द्वारा, जो पकिस्तान में भी बहुत लोकप्रीय हुआ करती थी,
के माध्यम से अपने बिछड़े प्रियजनों से जुड़ पाते थे . इस शिविर में बंदियों के लिए
अखबार और मैगजीन मुहैया करने का जिम्मा मनोहरलाल जी के पास हुआ करता था जो रांची के एक
स्थापित समाचार पत्रों के एजेंट थे और इस तरह युद्ध बंदियों से इनका मिलना जुलना हो जाता था . बड़े ही आत्मीय
व्यक्तित्व के मालिक थे मनोहर लाल, .किसी
के भी दर्द में शामिल हो जाना उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का एक आयाम था , पाक युद्ध
बंदी भी इससे अछूते नहीं रहे.
मनोहर लाल आजादी के समय
हुए बटवारे के एक भुक्तभोगी थे . सिंध में अपने घर से बेघर इस शक्श को आज़ाद
हिन्दुस्तान में अपने आप को सवांरने और व्यवस्थित करने में बहुत संघर्ष से गुजरना
पड़ा था . आजादी उपरान्त के उनके संस्मरण और भी विदारक थे जिन्हें कभी कभार वो मेरे समक्ष उड़ेल पड़ते थे. सिंध की उनकी यादे तलाश करती थीं उन
बंदियों में अपनी बिछड़ी माटी के नौनिहालों को . और एक दिन ऐसा आया की उस शिविर के
एक भाग में उन्हें ऐसे ही तीन युवक मिल गए जो उनके ही गाँव के थे. स्मृतियों के
आदान प्रादान में समय कुछ इस तरह दौड़ चला की पता ही नहीं चला की मनोहर लाल अखबार वाले से पहले कब उन लड़कों के चचा बन गए , ये तीन युवक अब चचा
से गोभी के पराठे , मक्के की रोटी और सरसों की साग की फरमाइश कर लेते और मनोहरलाल जी को भी
उनकी इन ख्वाहिशों को पूरा करने में मज़ा
आने लगा. धीरे धीरे मनोहरलाल जी को और भी युद्ध बंदियों की मांगे आने लगीं . जहां
तक संभव हो पाता उनकी पत्नी इन बिछड़े अपनों के लिए खाना बना दिया करतीं. उन्हें
बड़ा आनंद आया करता था जब उनके शौहर उन्हें कैंप से लौट कर शिविर में अपनों के बीच
बीते दिन के पलों और अनुभवों को बांटते .
पता नहीं कैसे मनोहर लाल
जी के इस बंदियों के साथ प्रगाढ़ होते संबंधों पर अधिकारियों की आपत्ति नहीं होती.
अधिकारी भी मनोहरलाल जी की कहानियों में
खूब दिलचस्पी ले रहे होते. उन्हें वे अधिकारी अब चाय भी पिलाते और उनसे बंदियों के
साथ होते अनुभवों की जानकारी लेते और उनकी
मानवीय प्रवृतियों की भूरी भूरी प्रशंषा करते. मनोहरलाल जी को तो आनंद
बांटने की आदत थी वो किसी को भी निराश नहीं करते फिर अधिकारियों को कैसे वंचित रख
सकते थे.
गोभी और आलू के पराठों के
बीच सिंध से जुड़ी यादों के बीच तीन पाक युवा युद्ध बंदियों ने मनोहर लाल जी को अब
उनके एहसानों को लौटाने की पेशकश कर डाली . उनमे से बहुत ने उन कुपंस को जिनके एवज
में उन्हें अखबार और अन्य पत्रिकाएं मिला करती थीं अब बिना पत्र और पत्रिकाएं लिए मनोहर लाल जी को देना शुरू कर दिया . इन कुपंस के एवाज़ में ही मनोहर लाल जी को पैसों का भुगतान हुआ
करता था . मनोहर लाल जी एक निहायत ही ईमानदार पर कुछ अधिक ही संकोची व्यक्ति थे .
उन्होंने पहले तो ऐसा करने से इनकार का दिया पर फिर उनका संकोची स्वभाव उनके आड़े आ
गया और वे पाक युवाओं का आग्रह स्वीकार करने लगे . वो उनसे कूपन तो लेने लगे पर
कभी भी उनको पैसों के लिए भुनाया नहीं .
पर अब वे कुछ बेचैनी सी महसूस करने लगे थे . उनसे उन पाक युवाओं की बेचैनी कुछ
बढती जाती नज़र आती थी . बेचैनी के बीच भी इन युवाओं का मनोहर लाल जी के प्रति
स्नेह बढ़ता गया . फिर एक दिन उन युवाओं ने कुछ बहुत ही अटपटा सा आग्रह कर डाला .
उन्होंने मनोहर लालजी को ढेर सारे कूपन दिए और कहा की उन कुपंस को भुनाकर वे आधे
पैसे खुद रख लें और आधे उन्हें दे दें. मनोहर लाल जी पेशोपेश में पड़ गए. उन्होंने
कूपन ले लिए और अपने घर चले आये . महीने में एक बार हिसाब होता था अबी ऐसा होने
में दिन शेष थे .इधर वो बेचैन रहते और उधर उन पाक युवाओं की बेचैनी बढती जाती
दिखती थी .मनोहर लालजी बहुत ही पीड़ा में
थे वे कुछ समझने लगे थे . उन्होंने जो समझ लिया था उसके गंभीर परिणाम भी थे जिसका
उन्हें एहसास था . मन था की उन युवाओं की घरवालों से दूर बेबसी से टूट जाता था पर
देश के प्रति निष्ठा उससे भी बढ़ कर थी . वो खामोश रहे पर अब उन युवाओं और उनकी बातों पर पैनी नज़र रखने लगे . इसी बीच
जब मनोहर लाल जी एक दिन बैरकों में समाचार पत्र और पत्रिका बांटने गए तो युवाओं के
बीच सिन्धी में हो रही बातों ने उनके कदम
रोक दिए . उन्होंने वह सुन लिया था जिसका उन्हें डर था , उन्हें समझ में आ गया था
की पाक युवा उन्हें वह कूपन क्यों दिया करते थे और उन्हें भारतीय मुद्रा की जरूरत
उस बंदी शिविर में क्यों आन पड़ी थी. शाम हो चली थी मनोहर लाल जी पहुँच गए
अधिकारियों के पास और उन्हें सारी बात बता
डाली . अधिकारियों ने बड़ी शान्ति से उनकी बातें सुनी, उन्हें चाय पिलाई और इधर उधर
की बातें करने लगे , जैसे कोई गंभीर बात नहीं . वो तो अपने घर लौट आये पर शायद
उनके लौटने के साथ ही शिविर में चौकसी बढ़
गयी , बैरकों की जांच होने लगी . दो दिन
बाद मालूम हुआ की उन युवाओं ने एक लम्बी सुरंग खोद डाली थी , इंतज़ार थी
उनको कुछ भारतीय मुद्रा की जिसका उपयोग कर शायद वो अपने वतन लौटने की कोशिश कर
सकते पर मनोहरलाल जी की देश भक्ति . गंभीर द्वन्द के क्षणों में उनकी
बुद्धिनिष्ठ्ता ने ऐसा नहीं होने दिया. बाद में वह ये भी समझ चुके थे जहां उन पाक युवाओं ने उनका बेजा इस्तेमाल किया था वहीँ
अधिकारियों ने उनके न जानते हुए भी उनसे बंदी शिविर में निगरानी करवा ली थी और वे
उनकी चाय पीते रहे थे. मनोहर लाला तो अब नहीं रहे पर उनका यह वृतांत भूलता नहीं.
वृतांत की सत्यता तो वही जाने , पर सुरंग तो पायी गयी थी और मनोहर जी
कभी झूठ नहीं बोलते थे.
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