कांग्रेस मुक्त भारत ? एक अतिशयोक्ति (2)
अगर बापू ने इस राष्ट्र को स्वाधीनता दिलाई तो लोह्पुरुष पटेल ने इस राष्ट्र को उसका उपमहाद्वीपीय स्वरुप दिया. चन्द्रगुप्त और अशोक के बाद अगर किसी ने इस राष्ट्र को उसके भव्य आयाम दिलाये वो लौहपुरुष पटेल थे. पटेल बापू के प्रिय अनुयायी थे और बापू से सृजित कांग्रेसी चेतना के अभियक्त स्वरुप थे और ऐसे दुर्लभ और अपरिच्छिन्न राष्ट्रीय व्यक्तित्व पर किसी एक पार्टी विशेष का एकाधिकार नहीं हो सकता. पटेल के चिंतन के अनुसरण से तत्कालीन कांग्रेसी चिंतन की भव्यता और बढती है. लौह पुरुष की गगनचुम्बी भव्य कृति भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन, राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधने वाले के साथ साथ कांग्रेसी चिंतन और उसके आग्रह की भी स्मृति चिन्ह बनी रहेगी. यह एक सुन्दर आग्रह है और ऐसा करने वाले साधुवाद के पात्र.
आज स्वाधीन भारत जिस रूप में भी व्यक्त है वह पूर्व के गंभीर चुनाओं और निर्णयों का परिणाम है.पराधीनता से आत्मनिर्भरता तक की यात्रा की महत्ता को कोई अर्थशात्री ही समझ सकता है पर इसके लिए अर्थशास्त्र के साथ साथ विवेकशील शूक्ष्म दूरदर्शिता का ज्ञान भी आवश्यक है. गंभीर विश्व समर की पशार्व्भूमि में आज़ाद हुए राष्ट्र को उत्तरीय और पश्चिमी क्षितिजों पर अवश्यम्भावी मंडराते समरों से अक्षुण रखते हुए सीमित साधनों में इसकी आधारशिला रखना और इसका अनवरत उत्तरोत्तर विकास करते रहने के आग्रह और क्षमता को कम आँक कर देखना इस राष्ट्र की , इसकी संकल्प शक्ति, और इसके दिव्य यज्ञ भावना का निरादर करना है. नेहरु और शास्त्री जी ने तो भारत के संम्भावनाओं का बखूबी दर्शन कराया और इसको मूर्त रूप दिया इसके निर्माणकर्ताओं ने, जिनमे इस देश के वैज्ञानिक, इसके अर्थशास्त्री ,इसके मजदूरों और किसानों, और इस साकार राष्ट्र निर्माण और विकास संकल्प को सुरक्षित रखा कपडे के जूते पहने , जर्जर बंदूकों ,गिनीचुनी गोलियों के सहारे हमारे जवानों ने. और वे तबतक ऐसा करते रहे जबतक राष्ट्र ने उनको सुसज्जित करने की क्षमताएं पा नहीं लीं. इन स्थितियों में नागरिकों ने राष्ट्र को कांग्रेस के नेतृत्व को समर्पित किये रखना उचित समझा. जब अंग्रेजों ने भारत को छोड़ा था तब हमारे शिल्पों की उंगलियाँ कटी हुईं थी और अर्थव्यवस्था साधनविहीन. कुछ दशकों बाद , आज हम अपने पडोसी देशों को बार बार सहयोग देते हैं .चाहे लंका हो , नेपाल हो, बाग्लादेश हो या अफ़ग़ानिस्तान हो और ऐसा इसलिए संभव क्यों की हम मे आज ऐसा कर पाने के सामर्थ हैं . आजादी की बेला में हम एक विपन्न राष्ट्र थे वर्ना पाकिस्तान को उस वक्त पचास करोड़ देने की बापू की वकालत उनकी शहादत का कारण नहीं बनती. या हमें घोड़ों के लिए अमरीका में उपजाए जा रहे गेहूं, जिसे हम उस देश से PL 480 के जरिये अनुकम्पा स्वरुप पा रहे थे , उसकी आवशयकता नहीं पड़ती. पर हमें उसे भी स्वीकारने की आवशयकता पड़ी. इस आर्थिक विपन्नता के मध्य और जब कोई मददगार मदद करने को तैयार नहीं था देश ने कांग्रेस को बार बार राष्ट्रनिर्माण का दायित्व सौंपा. कांग्रेस ने राष्ट्र से त्याग की प्रार्थना की और राष्ट्र ने दशकों उपभोग को त्यागा और राष्ट्रनिर्माण के लिए भूखे नंगे छतविहीन रह कर पूँजी निर्माण में सहयोग किया. माता बहनों ने अपने आभूषण उतार दिए. राष्ट्र के उधोगपतियों ने वाहन के नाम पर मात्र एम्बेसडर,फ़िएट,और स्टैण्डर्ड जैसे वाहनों पर घूम घूम कर पूँजी निर्माण में बहुमूल्य योगदान दिया और हमारे किसानों ने बैलो के साथ खुद के जोड़े बनाकर, कुओं से पानी खींच खींच कर हमारी क्षुदा की अग्नि को शांत किये रखा. अर्थव्यवस्था की कश्ती सागर का विरोध किये बगैर उसके तरंगो के साथ तादात्म्य स्थापित कर आंधियों से लोहा लेते हुए, इस राष्ट्र को हरा भरा जिन्दा और आबाद रखा , हमारे जवानों ने हिमालय को अपने रक्त से लाल कर दिया पर इसकी आजादी पर आंच नहीं आने दी. हाँ कुछ इस तरह यह राष्ट्र बना, वीर जवानों का ,दीवानों का, मस्तानों का, जो अब हसने लगा था सावन में और भादों में.
दुःख यह की हम में से कुछ आप और कुछ हम ने प्रगति के रथ की ऐतिहासिक यात्रा को नहीं देखा वर्ना सिर्फ राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए स्वर्ग के वातायन से नीचे देख रहे अपने शहीद पूर्वजों, राष्ट्र निर्माताओं और देशप्रेमियों के बलिदान और आग्रहों को इस तरह कम करके नहीं आंकते, कमसकम जुमलों की अपनी कसरत के बीच “मेक इन इंडिया” का दण्ड बैठक करते वक्त इतना तो सोचते की हम जिस व्यायामशाला में दण्ड बैठकी कर रहें हैं वह आयी कहाँ से और आज जिस आर्थिक व्यवस्था की ओर हम अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करने की चेष्टा कर रहे हैं वह कैसे, कब और किन किन की दूरदर्शिता वश अपने यौवन के निखार को प्राप्त हो सकी. राष्ट्रीय कर्मण्यता और संकल्प को इस विवेकशून्यता के साथ कम आंककर उनका अपमान नहीं करते. आपके मैकारे की उत्तेजना को सुन सुन जब आपके अनियंत्रित अहम् ने मन को ही ललकार दिया तो मन की बातें छोड़, अब हों विवेक की बातें . गीता बाटना काफी नहीं अनियंत्रित मन को अपनी विवेकवती बुद्धि , कृष्ण के नियंत्रण में रखने की कला ही तो गीता का सार है ..... क्रमशः
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