Tuesday, 24 May 2016

कांग्रेस मुक्त भारत , एक अतिश्योक्ति ( 6)



इतिहास स्मृति पटल पर अंकित वह सत्य  है जिसे बदल पाना संभव नहीं पर अब राजनीतिक  संस्कार कुछ जरूर बदले नज़र आतें हैं. जब भारतीय  संसद पर हमले की खबर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को मिली तो उन्होंने तत्काल आदेश दिए की सोनिया जी की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाये , उनका ऐसा कहना उनका संसद के दूसरे सदस्यों की सुरक्षा को कुछ कम आंकना नहीं था , वह एक बहुत ही स्वच्छ मानवीय परमपरा की अभिव्यक्ति थी हाँ कुछ नए इतिहासकार इसे कुछ अलग नज़र से आँक सकते हैं. जब राजीव गाँधी सत्ता में थे, उन्हें मालूम पड़ा की अटल जी का स्वास्थ लाभ के लिए विदेश जाना नितांत आवश्यक था तो उन्होंने अटल जी को विदेश जा रहे एक प्रतिनिधिमंडल का सदस्य बना दिया ताकि एक इमानदार देशभक्त का सही उपचार हो सके और उन्होंने इस तथ्य की गोपनीयता बनाए रखी पर इतिहास ने इसे ढूंढ लिया और इस आचरण को पीढ़ियों के लिए दर्ज कर लिया. जब 1971 में पाकिस्तान ने भारत के हांथों मुह की खाई और उसके दो टुकड़े हो गए और बांग्लादेश का वजूद बन सका तब संसद में तत्कालीन प्रधानमन्त्री के लिए तत्कालीन जन संघ के अग्रणी नेता अटल जी के उदगार , उनका श्रीमती गाँधी को चंडी का स्वरुप बताना उनकी महिमा को ही दर्शा गया , ऐसा एक महान व्यक्ति का दूसरे  महान व्यक्ति के प्रति दलगत राजनीती से ऊपर उठी एक अभिव्यक्ति थी जो राष्टीय राजनीतिक संस्कृति को अलंकृत कर सका. जब नरसिम्हा राव चुनाव हार गए तो वे भावी प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को कार्यालय में ले गए और एक गंभीर राष्ट्रीय  सुरक्षा से सम्बंधित मामले की ओर उनका ध्यान आकृष्ट करते हुए उनसे आग्रह किया की वे उस मामले को उसके नतीजे तक  पहुंचाने में विलम्ब ना करे और अटल जी ने वैसा ही किया . आपात काल  के बाद जब लोक नायक जय प्रकाश का देहावसान हुआ और इंदिरा जी पटना आयीं तब कुछ लोगों ने उत्तेजना दिखाई , जनता पार्टी के अग्रणी  नेता चंद्रशेखर  ने तुरंत उत्तेजित लोगों को फटकार लगाई और खुद श्रीमती गाँधी को अपने साथ ले लोकनायक के अन्तेष्ठी स्थान तक गए .गुजरात में जब दंगे संभाल के बाहर हो रहे थे तो अटल जी ने अपने ही मुक्यमंत्री को राज धर्म निभाने की सलाह दी . अटल जी के साशन ने उत्तेजना तो देखी, बोफोर्स प्रकरण का राजनीतिक उपयोग भी देखा पर शालीनता  का कभी भी ऐसा हनन नहीं हुआ जैसा अब होता है. आपने जब चुनाव जीता और उसके बाद अलग अलग राज्यों के दौरे पर गए तब आपके साथ उपस्थित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का आप ही के लोगों ने उपहास किया , आपने या आपके दल के किसी भी नेता ने संघीय अवधारणा के ऐसे  मखौल को रोकना उचित नहीं समझा   न ही आप   एक करोड़ की गर्लफ्रेंड का अमर्यादित उल्लेख  करने से गुरेज़ कर सके . राजनीतिक दलों के हमारे  कुछ नेता देश के आदर्श स्रोत रहे हैं . उन्होंने जो आदर्श  स्थापित किये वे अलग अलग दलों में उभरते नेतृत्व क्षमताओं के प्रेरणास्रोत बने . आपके के एक नेता ने तो अलग मान्यताएं रखने वालों को भी पाकिस्तान  में धकेल देने की भी बात कर डाली , कल ही उत्तराखंड में आप ही के एक सांसद क्रुद्ध सवर्णों के  कोपभाजन बन  गए , उनके वाहन को जला दिया गया उन पर पत्थर फेंके गए , उनका दोष सिर्फ इतना था की उन्होंने ने एक दलित को मंदिर में प्रवेश दिलाने की गुस्ताखी कर डाली थी . अच्छा लगा तो सिर्फ इतना की राज्य के मुख्य मंत्री ने अपने संस्कारों और दायित्वों को हालिया कटु स्मृतियों  के हत्थे नहीं चढ़ने  दिया और वे  सांसद श्री तरुण विजय का हाल पूछने अस्पताल पहुँच गए . दो राजनीतिक विरोधियों का यह मिलन भी इतिहास ने दर्ज किया. आपने राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान दिया, उसे ऊंचे स्तंभों पर स्थापित किया  ,आपने राष्ट्रीय मानचित्र से छेड़छाड़ को अपराध घोषित किया, आपने महात्मा गाँधी के पोते की खोज खबर के लिए एक मंत्री को भेजा . इन सबके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं पर विरोधाभास इस बात में है की विदेशों में आप गाँधी जी की मूर्तियों पर माल्यार्पण करते हैं , शीश  नवाते हैं ,पर देश में उनकी  गन्दी चर्चाओं पर आपका मौन क्यों बना रहता . यदि राष्ट्रीय ध्वज का अपमान अपराध है, उसके मानचित्र के साथ खिलवाड़ अपराध है तो फिर देश को आज़ादी दिलाने वाले  राष्ट्रपिता की सोशल मीडिया पर इस तरह का अपमान किस तरह आपकी नज़र में नहीं आ सका , आप ने राष्ट्रपिता  का ऐसा अपमान कैसे सहा और इसे रोकने में रूचि क्यों नहीं दिखाई. गांधी जी की हत्या की दो वजहें बतायी जातीं हैं ,एक उनका पकिस्तान जाने की जिद और दूसरी उनकी पाकिस्तान को कुछ धन देने का आग्रह . आप भी तो अचानक बिना किसी कार्यक्रम के वहाँ पहुँच गए ,ऐसा कर आपने कोई गलती नहीं की .पड़ोसियों से अच्छे सम्बन्ध बनाए रखने की पहल बनाई रखनी चाहिए यह शुद्ध रूप से पड़ोसियों के हित में है , कांग्रेस ने भी पकिस्तान के साथ अपनी विदेश नीति का निर्वाहन कुछ इसी तरह किया पर तब यह आपको रास नहीं आया अब आप गोलियों से जवाब देने से हिचकिचाते नज़र आते हैं. एक पडोसी हिन्दू राष्ट्र है नेपाल ,कल ही खबर आई की चीन अपनी रेल पटरियों  का विस्तार करता  हुआ अब बिहार  की सरहद को छूने  ही वाला है , आखिर हमारे किस  आचरण से हमारा यह भाई देश हमसे खफा हो दूसरों से रिश्ते  जोड़ने लगा कि नौबत यहाँ तक आ गयी . आप अमरीका की ओर कुछ इस तरह खिंचते चले गए की आपका परखा हुआ मित्र रूस  जो आपके साथ शान्ति एवं युद्ध दोनों ही स्तिथियों  में बना रहा आज चीन और पकिस्तान के साथ नजदीकियां  बनाने को विवश है. रूस वही देश है जिसने जब हमें पकिस्तान के साथ युद्ध करते समय बंगाल की खाड़ी में अमरीका  के सातवे  जंगी बेड़े का सामना करना पड़ा तब उसने हमारे आत्मविश्वास को बनाए रखने के लिए अपना छठा  जंगी बेड़ा भेजा और संयुक्त राष्ट्र में अमरीका के भारत के विरोध में आ रहे हर प्रस्ताव के खिलाफ और हमारे पक्ष में वीटो का इस्तेमाल किया और तब तक  ऐसा करता रहा जब तक हमने युद्ध में विजय हासिल नहीं कर ली. ......... क्रमशः

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