Monday, 23 May 2016

कांग्रेस मुक्त भारत , एक अतिशयोक्ति (5)



            कांग्रेस मुक्त भारत,   एक अतिशयोक्ति (5)


 जिस तरह कांग्रेस किसी की निजी मिलकियत नहीं हो सकती है उसी तरह इस राष्ट्र का शाशन किसी दलविशेष का एकाधिकार नहीं . कांग्रेस का हालिया आचरण शोचनीय है ,हमने संसद में हठधर्मिता का परिचय देकर राष्ट्रिय जनभावना का निरादर किया है. पूर्व में भी विपक्षी दलों ने संसद में ऐसे  आचरण का परिचय दिया पर क्या उनका ऐसा आचरण ही कांग्रेस की प्रेरणास्रोत बने. दो गलतियाँ एक सही की निर्माता नहीं बन सकती. हम अपने वर्तमान हश्र का दोष किसी अन्य को नहीं दे सकते यह हमारे निरंकुश उछश्र्नख्लता  का ही परिणाम है. हममें से एक तथाकथित बुद्धिजीवी ने कुछ इस लहजे में मोदीजी के पूर्व के जीवनयापन के साधन पर असम्मानजनक टिपण्णी कर डाली  की वह आम आदमी सहित हर  उस कांग्रेसी को भी  दर्द  दे गया जिन्हें   इंसानियत और मनुष्योचित वाणी सैंयम का ज्ञान है.एक सच्चा कांग्रेसी और गांधीवादी सर्वप्रथम तो  कदापि कभी ऐसा वक्तव्य देता नहीं और अगर आवेग्वश  ऐसा हो भी गया था तो इसके लिए क्षमाप्रार्थी होना कद को छोटा नहीं कर जाता. अगर हम कांग्रेसी राष्ट्रप्रेमी हैं तो हमारे विपक्षी भी हमसे कम नहीं . हाँ हममे से कौन सा दल कौन सा नेता राष्ट्र की बागडोर सँभालने की अच्छी सलाहियत रखता है उसकी परख इस देश की जनता रखती है.
 वह गुण दोष के आधार   पर अपना मत प्रकट करती है  इस वक्त वह  वस्तुस्थिति को कुछ इस तरह समझ रही  है की मनमोहनजी की खाने की थाली में भोजन तो होता था पर चटनी नदारत रहती थी ,मोदी जी की थाली में अबतक चटनी ही मिली है खाना नदारत रहा है. कांग्रेस राष्ट्र को निराशा से बाहर निकालने में असफल रही वहीँ मोदीजी ने राष्ट्र में आशा का संचार बखूबी किया. लम्बी अवधी तक सत्ता से बहार रहने के बाद दस वर्ष के अपने कार्यकाल में  पिघलते वैश्विक अर्थव्यवस्था  की पृष्ठभूमि और पेट्रोलियम के बढ़ते कीमतों के दौर में जिस तरह अर्थव्यवस्था को मनमोहन जी  ने समायोजित रखा उसे कम आक कर देखना  एक बार  फिर राष्ट्र और उसकी  सृजन क्षमता को कम आंकना, इस राष्ट्र का उसके निर्माणकर्ताओं का अपमान है तत्कालीन सत्ताधारी दल का ही  नहीं. सरकार तो राष्ट्रीय मतों की अभिव्यक्ति है ,समष्टि  आकान्शाओं का व्यष्टि  स्वरुप जिसकी अभिव्यक्ति वर्तमान सरकार है . आज की सरकार जिन उपलभ्दियों को अपनी बता रही है वो मात्र एक श्रृखला की कड़ी है जिसमे सभी पूर्व सरकारों का योगदान रहा है , चाहे वो कांग्रेस की सरकारें रहीं हों, भाजपा की या किन्ही अन्य की . जिन उपलभ्धियो को वर्तमान सरकार आज दो  साल की अल्प आयु में अपनी बताती नज़र आती है वह निर्लज्जता की पराकाष्ठा से अधिक कुछ नहीं. भावनाओं के समीकरण कुछ समय तक कारगर होतें हैं पर कालांतर में सारी बातें विवेक  की कसौटी पर परखी जाती हैं और सामाजिक मान्यताएं भी परिपेक्ष प्रस्तुत करती हैं जिनके पार्श्वभूमी में तमाम विषयों का अवलोकन होता है .
 राह चलते हुए एक बालक मिल गया ,फूट फूट कर रो रहा था ,  कहता था उसके पिता  की मृत्यु हो गयी ,राहगीरों ने उसकी खूब मदद की ताकि  उसके पिता की अन्तेश्ठी हो जाये . फिर कुछ ही दिनों बाद वह एक दूसरी जगह मिला वैसे ही फूट फूट कर रो रहा था ,कहता था उसकी माता गुजर गयीं ,राहगीरों ने फिर उसकी मदद की. कुछ दिनों बाद वह फिर दिखा उसी तरह रोता था ,उसके पिता एक बार फिर गुजर गए थे. वास्तविकता से अपरिचित कुछ राहगीर उस दिन भी उसकी मदद कर रहे थे पर कुछ ऐसे भी थे जो अब समझ चुके थे की वह लड़का लोगों की भावनाओं का अनुचित फायदा उठा रहा है . उस वाक्य विवेक भावनाओं पर बहरी पड़ चूका था .
हम सबके ह्रदय  अपनी और दूसरों की माताओं के लिए सम्मान व्याप्त रहता है . जब माता के विषय में बात करते हैं तो वह जगद्जननी के ही समकक्ष हो जाती है . हुम जब दुर्गा शप्त शती  में क्षमा  याचना करते है तब माता से कहते  हैं, पूत कपूत हो सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती. आप अपनी माता को याद करते समय अक्सर भाव विभोर हो जाया करते हैं उस वक्त मेरी भी भावनाएं आप से जुड़ जाती हैं क्योंकि मेरी माता ने मुझे  माँ शब्द का अर्थ अपने वात्सल्य से अनुभव कराया था . पर जब आप इतने संवेदन शील हैं तो आपके अनुयायी किस तरह किसी और माता की भर्त्सनीय निंदा कर जाते हैं . किसने क्या अपराध किया ? किया या न किया ? उसकी न्यायिक परख और स्थापना होने से पूर्व किसी की भी माता के साथ ऐसा व्यवहार हो, एक देवी का उपासक जो अमरीकी दौरे के समय भी माता के  नौ अवतारों को स्मरण रखता है, उपवास रखता है ,कैसे अपने ही लोगों के ऐसे आचरण पर मौन रह सकता है ? यह कैसा विरोधाभास. आरोपों के  स्थापित होने के बावजूद भी क्या शास्त्र और न्याय किसी की भी माता के साथ  ऐसे आचरण की आज़ादी देतें  हैं ? आपकी हिंदूवादी विचारधारा कुछ अजीब सी लगती है . आप ब्रह्मैक की बात कर वसुधैव कुटुम्बकम की बाते करते हैं पर दूसरे धर्मावलम्बियों से आपके अनुयायियों के मतभेद हैं, वे उन्हें एक ही ब्रह्म का स्वरुप नहीं मानते . आपका द्वैतवाद भी कुछ अटपटा सा प्रतीत होता है क्यों की आपका  द्वैतवाद  अमित शाह से आगे नहीं जाता . कल के देव अटल , आडवानी , मुरली मनोहर जोशी जसवंत सिंह ,जिन्होंने भाजपा को उसका वृहत  स्वरुप दिया आज हाशिये पर क्यों ? कैसी भी हो कांग्रेस पर उसने अपनी नेत्री को हाशिये पर यो नहीं धकेला जैसा आपने अपने शुभ चिंतकों को. आपका अहम् आपके आड़े आया . आखिर आप किधर जा रहे हैं , आपका अपने नाम के जयकारे से इतना लगाव क्यों ? आप जिस देश में भी जाते हैं लोग आपका जय कारा करते है पर आज देश के अन्दर  चुनावी भाषणों के दौरान वह मोदीमय  माहौल, वो नारे  गायब क्यों? क्यों नहीं देती जनता आप के द्वारा उनकी ओर उछाले जाते प्रश्नों का जवाब जो पहले उनसे तडा तड़ मिला करते थे ? इसे कहते हैं शुद्ध शब्दों  में मोह भंग होना . दिल्ली गयी , पटना गया हाँ असम ने आपको स्वीकार जिसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं . दक्षिण क्यों नहीं स्वीकार कर प् रहा आपकी राजनीति को उसका उत्तर आपको आपके ही आत्मचिंतन से प्राप्त हो सकता है . आगे का सूरतेहाल भी कुछ अच्छा नहीं . इतिहास बदलें  देश ने आपको मत दिया है , जनमत की अपेक्षाओं पर खरे उतरिये ,ये क्या लग गए आप इतिहास से छेड़ छाड़ करने में . इतिहास काल का लेखा जोखा है . जो बीत गयी सो बात वहीं , आगे की बनाइयें.    

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