कांग्रेस मुक्त भारत ? एक अतिशयोक्ति (3)
अगर आज़ाद भारत “मेक इन इंडिया “के प्रति आजादी की बेला से ही समर्पित नहीं रहता तो क्या आज आप उसे नए कलेवर में प्रस्तुत कर पाते? और क्या टेक्नोलॉजी आपको, आपकी तीन आयामी आकृतियों में ,एक ही वक्त देश और विश्व के अलग अलग भागों में आवाम से संपर्क में रहने का सामर्थ दे पाती . आजादी की बेला में अंग्रेजी शाशन द्वारा विरासत में छोड़े गए कुटीर औधोगिक अर्थ व्यवस्था को नूतन औधोगिक आर्थिक व्यवस्था में तब्दील करना , भारी उध्योगों की स्थापना करना , वैसे समय में जब राष्ट्र एक अपंग पूँजी विहीन राष्ट्र था , फिर उसको शीत युद्ध के साए में चार चार युद्धों के पार ले जाना और आत्म निर्भर बनाना कोई जुमलों का खेल तो नहीं था. राष्ट्र को बहुत कठिन निर्णयों से गुजरना पड़ा . हमने आयात पर पाबन्दी लगा, बचत को प्रोत्साहित किया और उस बचत का निवेश कर पूँजी निर्माण किया और एक पराधीन राष्ट्र को आर्थिक स्वतंत्रता की ओर बढ़ाया. बहुत सी मुश्किलों से गुजर यह राष्ट्र आपको अपनी कर्मस्थली के रूप में मिला . आप अपना और देश के समय और सम्पदा का उचित निवेश करते नज़र नहीं आते . आप लग गए राष्ट्र को दूसरी पार्टियों से मुक्त करने की जुगत में , पूरे संघीय ढांचे पर ही खतरा मंडराने लगा , कैसे साकार हो पायेगा आपका नारा , सबका साथ सबका विकास ? . अगर संकीर्णता बनी रही तो सबका साथ कैसे बन पायेगा फिर क्या कोई रोक पायेगा कोई सबको सबके विनाश से ,जागिये ! अत्यधिक अहंकार स्मृतिविभ्रम का कारण बनता है और अहंकार का आधिक्य, व्यक्तित्व को ही भिखेर डालता है और आपकी कांग्रेस की हठ भर्त्सना आपके राष्ट्रीय इतिहास के ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह है. हमारे वैज्ञानिकों का कमाल , वो वैज्ञानिक जिन्होंने आर्थिक विपन्नताओं के बावजूद राष्ट्रीय त्याग और बलिदान से स्थापित हमारे शिक्षण संस्थानों में राष्ट्र निर्माण के लिए तालीम हासिल की और राष्ट्र निर्माण में लीन रहे पर आप इनको भी नज़रंदाज़ करते हैं, कम आंकते हैं. आप कांग्रेस को अहिन्दुवादी समझते हैं . पर यह सत्य से परे है . आप हिंदूवादी थे तो जिस एक आधार पर आपने अपनी राजनीतिक यात्रा प्रारंभ की उस आधार को ही क्यों छोड़ दिया , जब बाबरी मस्जिद गिरी तो अडवाणी जी रो पड़े , शायद इसलिए की अब वह लक्ष ही नहीं बचा था जिसपर अब आपके राजनीतिक तीर चला पाते . विवादित ढांचे के गिरने के बाद आप कई बार सत्ता में आये पर आप में मंदिर निर्माण के लिए वो तत्परता नहीं दिखी जिस तत्परता ने कुछ लोगों में अवांछित उर्जा का संचार किया . कितने बच्चों का बलिदान हुआ , माताओं के कोख सूने हुए ,क्या है आपके पास टूटी माताओं का कोई आंकड़ा या फिर उन का नाम जो एक धक्का देने के चक्कर में अपने घरों को ही सूना कर गए . हाँ आपने उन्हें शहीद कहा और इतना ही काफी समझा . क्या यही है आपका हिन्दुवाद. अगर आप वास्तव में वह हिन्दू वादी हैं जिसका आप प्रचार करते हैं और जो आपकी राजनीतिक पूँजी है तो क्यों बैठे हैं आज खामोश, क्यों नहीं बन पाया वह मंदिर आपकी पार्टी के कार्य कालों में ? हाँ भारत एक हिन्दू बहुल राष्ट्र है और हिन्दू धर्म दर्शन ही कांग्रेसी चिंतन की आधारशिला बनी. वो जो सही मायने में हिन्दू धर्मावलम्बी हैं उन्हें किसी भी अन्य धर्म या उसके अनुयायियों से डरने की आवशयकता नहीं पड़ी. हिन्दू कायर नहीं उसमें वो लहू दौड़ता है जो राष्ट्र पर आये किसी भी खतरे का मुंहतोड़ जवाब देने की शक्ति रखता है. सहिष्णुता ही शक्ति है वह क्रायोजेनिक तकनीक है जो महादेव के त्रिशूल में अभिप्रेत है जिससे वध होता है तीन शूलों का , क्रोध ,लोभ और मोह. जब इन शूलों का वध होता है तब अर्जुन अपने नव अवतार में अवतरित होता है , महा भारत होता है , कौरव हारते हैं और पांडवों की जीत होती है . हिन्दू धर्म सनातन और सिद्ध आपसे नहीं और नाही आपकी ठेकेदारी से . जब जब वतन पर खतरें मंडराएं हैं हिन्दुओं ने अपने सर कम पड़ने नहीं दिए नाही उन्होंने, जिन्होंने राष्ट्र के लिए काम आने में हिन्दुओं के साथ राष्ट्र के लिए अपनी बलिदानी दी . कट्टरपंथ किसी भी धर्म में अभिप्रेत नहीं फिर क्यों न वह हिंदुत्व हो या इस्लाम , सिक्खी या क्रिस्चियन या की कालांतर में आडम्बर के विरोध में स्थापित हुए जैन या बौधिक आस्थाओं मे. हममे से कुछ विकृत अति उत्साही तथाकथित धर्मावलम्बी एक दूसरे के प्रति सहिष्णुता का परिचय नहीं दे पाते तो वास्तव में हमने अपने अपने धर्म और उसके संतों और पैगम्बरों के दर्शन को समझने में भूल कर दी है. आज विश्व में जिस रूप और जहाँ भी कट्टरपंथ मानवता को आतंकित कर रहा है वह धर्म क्यों नहीं उसे समझने के लिए सर्वप्रथम सारे धर्मावलम्बियों को धर्मों से भिन्न मानव धर्म के मूल मानवता और उसके अनुशाशन को समझने की आवशयकता है और तब और तब ही धर्मावलम्बी एक दूसरे की आस्थाओं का सम्मान करने की समझ विकसित कर पाएंगे. विश्व के सारे धर्म शुद्ध रूप से मानवता द्वारा अपेक्षित सद आचरण की ही अव्धार्नाएं हैं जो इनके धार्मिक ग्रंथों में दर्ज हैं. जिस जिस ने उस सर्वशक्तिमान परवरदिगार और उसके द्वारा मानव जाती से उसकी अपेक्षाओं को समझने में बेईमानी कर दी और सहिष्णुता की बलि दे डाली वही सही मायने में काफिर है.वह न तो हिन्दू है ,न क्रिस्चियन, न मुसलमान न सिख न इसाई. और जो धर्मावलम्बी मानव, परवरदिगार की अपेक्षाओं को शुद्ध रूप से समझ पाया, उस पर अवलंबित रहा वही एक सच्चा और सार्थक धर्मावलम्बी है. साधनाओं में लिप्त यह संसार साध्य से ही दूर रहा, उस साध्य से , जिसे हम अल्ल्लाह में समझते हैं और इश्वर में ढूंढते हैं उससे सदैव दूर होते गए और मूढ़ता में लीन उसी के बन्दों की उसी के नाम पर कत्लेआम करते चले गए. धर्म के आड़ में मानवता से दूर हम अपने आचरण को पशुवत बनाते चले गए. जिस तरह हमने धर्म को आडम्बरों में जकड़ दिया उसी तरह हमने लोकसेवा का भी हश्र कर दिया. धर्मान्तरण कोई नामकरण नहीं, यह तो मानव से मानवोचित आचरण का आग्रह है और इस आग्रह में न तो हिंदुत्व न इस्लाम न ही क्रिश्चियनिटी और न ही किसी अन्य धर्म की और न ही ग्रंथों में निहित इनकी अव्धार्नाएं भिन्न हैं. इसीलिए कांग्रेस हर धर्म के मध्य समभाव की स्तिथि में है और अगर इसकी मान्यताएं एवम अव्धार्नाएं हिंदुत्व से प्रेरित हैं तो राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर शायद आज मात्र एक ऐसा संगठन है जिसे हिंदुत्व और हिन्दू धर्म की समझ थी, है और सदैव रहेगी. संविधान में धर्म्संभावना हिंदुत्व के शुद्ध स्वरुप की ही अभिव्यक्ति है. .......... क्रमशः.
No comments:
Post a Comment