Saturday, 30 January 2016

डाकिया,....... एक, संस्मरण, मित्र चारु के लिए


रिफिल प्रचलन  में थे, खास कर शीफर्स और पार्कर जैसे कलमों के लिए; और “ मेड इन चाइना” और “मेड इन जापान”  कलमों का होना स्टेटस  सिंबल, पर अभी देश डिस्पोसेबल्स की दुनिया से अनजान था,कलमों की प्यास सुलेखा और शिप्रा नामक रौशनायियों से बुझती थी , इन्ही कलमों की लिखावट से मुहब्बती पैगाम अपनी जुबान खोलते थे और इन्ही हस्तलिखित खतों की अहमियत को संवेदनशीलता का मानक समझा जाता  था. पत्रलेखन की पारम्परिक शैली जो कभी लिफाफों में, अतार्देशियों में और कभी पोस्टकार्ड में संदेशों की मंजिलें तय  कराया करतीं थीं , अभी  जिन्दा थी . बच्चों की शरारत को झेलते लाल लैटर बॉक्स अभी लुप्त नहीं हुए थे ,बच्चे अब भी इन डब्बों में ढेले और पत्थर डालकर आनंदित होते थे.

 दिन के किसी वक्त जब उसके आने का समय तय होता था लोग उसके इन्तेजार में नज़रे पसारे बैठे रहते थे, ड्रेनपाइप पतलून का स्थान अब बेल बॉटम लेने लगे थे पर इनके बीच वह खाखी  कमीज के नीचे कभी बेतरतीब तो कभी करीनगी से महरूम कुछ मटमैली सी धोती या फिर किसी ढीली ढाली पतलून में काँधे पर एक भारी भरकम बसते का बोझ और हाँथ में खतों का पुलिंदा लिए ख़ामोशी को अपने  चिर परिचित संबोधन  से तोड़ बैठता,  पोस्टमैंन !

दिनचर्या के मध्य इस आगंतुक का आगमन एक सुखद अनुभव हुआ करता था .लोग इसका इंतज़ार एक चिरपरिचित व्याकुलता के बीच करते थे . वो व्याकुल्तायें जो, संयुक्त परिवार के बिखराव से जनम रही थीं. औधोकीकरण और राष्ट्र की अन्य प्रगितिशील योजनायें अपनों में दूरियां बढाने लगीं थी रेल गाड़ियाँ वाष्प से चलती थीं और इने गिने फौकर और चार इंजन युक्त वाईकोंट विमान  से  वायुयात्रा  धनाढ्य वर्ग के  ही  साधन हुआ करते थे, उस आगंतुक का दैनिक आगमन कभी सुख कभी दुःख कभी आशा और कभी निराशा का सन्देश वाहन  करता था. जब माताएं, वृद्ध पिता, सरहद पर तैनात सैनिकों के  परिवार और उनकी पत्नियों और उनके बच्चों को उसका दिन प्रतिदिन निर्बाध आगमन उन्हें जोड़ जाता. किसी माता किसी पुत्र, किसी बेटी,  किसी वृद्ध पिता को  मनि आर्डर का इंतज़ार हुआ करता था. टेलीफोन कुछ लोगों के पास ही होते थे और सेल फ़ोन अकल्पित थे. उसकी अपनी महत्वपूर्णता अद्वितीय थी जो पसरते काल में कहीं लुप्त हो गयी.

यह डाकिया भी उन्ही में से एक था और हमारे बचपन की शरारतों का एक चिरपरिचित लक्ष. जब उसके बसते को हम में से कुछ शरारती बच्चे छुपा दिया करते और जब वो उसे ढूंढता तो झाड़ियों की  ओट में छिपे हमारे आनंद का विषय बन जाता और उसी बसते का हमारे द्वारा ढूँढा जाना, ताम्बे के एक पैसे वाला लेमोनचूस जो वह दूसरे दिन हमें मुस्कुराते हुए बड़े प्यार से बीते दिन उसके बसते को ढूँढने के पारितोषिक के रूप में वह  देता.

 पर इस शरारत का दृष्टा बनना एक टीस भी दे जाता.उस डाकिये की मुस्कराहट के बीच एक दबी दर्द भी हुआ करती थी जो जब भी वह हमारे निवास पर आता, उसकी मस्तक पर अंकित लकीरों और उनकी आँखों से प्रकाशित हो रही होतीं. ,उसकी नज़रें किसी को ढूंढती थीं ,वह भी बहुत दिनों से. उसकी आँखे जिसे ढूंढती रहतीं शायद  वह कौन और इस वक्त  कहाँ था, शायद वह जानता था, पर उससे उसके आने का समय कभी भी उसका उससे मिलना संभव नहीं करा पाता. वो जो दूसरों  की व्याकुलता को दूर करता, खुद सदा किसी की खोज में पता नहीं कबसे व्याकुल था . कभी कभी वह पूछ बैठता, सर नहीं हैं?

प्रशाशकीय अधिकारी बानने से पूर्व जब पिताजी ने  बहुत ही कम उम्र में अपना  शिक्षण समाप्त  कर लिया था, तो सर्वप्रथम रोज़गार की तालाश  ने उन्हें एक शिक्षण संस्था में नियुक्ति दिलाई. उनके बहुत से  तत्कालीन विध्यार्थी  पटना के इर्द गिर्द गावों से हुआ करते थे जो बाद में हमसे स्नेह रखते हमारे चाचाओं में बदल गए वो कालांतर में हमारे जीवन का अभिन्न अंग और अनुभव बन गए. एक राम कुमार चाचा बताया करते थे, “ बचवा जहिया तोहार बाबू हमनी के पढ़ावत रहीं,तौना समय तोहरा बाबूजी के ठीक से मूछ दाढ़ियो न निकलल रहे, हमनी का आपस में करत  रहीं की ठीक समय पर हमनी के ब्याह होला से हमनी के बाल बाचा इनके उम्र के होतिन.”

 इतने कम उम्र का शिक्षक, उन्हें प्रीय और उनके लिए एक अनोखी अनुभूति थी. उनकी टिपण्णी प्रासंगिक थी क्यों की स्कूल और महाविधालयों की संख्या तब इतनी नहीं थी, और मेट्रिक पास, बी ऐ पास होना महत्वपूर्णता का सूचक होता था.

 पिता जी के छात्रों ने जीवन में अपनी अपनी सार्थक विशेषताएं अर्जित कर समाज और शाश्कीय व्यवस्थाओं में विशिष्ट बने इनमे एक आगे चलकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी बने. व्यक्तिगत विशिष्टताओं के मध्य अभी गुरु शिष्य परम्पराएँ लुप्त नहीं हुई थीं, बाबूजी सामाजिक  संबंधों में, इतना नज़र तो नहीं आते थे पर संबंधों के प्रति संवेदनशीलता उनमे बनी रहती.

उस दिन पिता जी किसी कारण से उस वक़्त घर पर थे. सीढियां जो बहुत तो नहीं थीं, अचानक किसी के विलाप ने उन पर मेरे चढ़ने  की गति $को बढ़ा दिया, साथ में ह्रदय की गति को भी. यह कौन और किस वजह से विलाप कर रहा था. दरवाज़े के करीब पहुंचा तो पिताजी के सम्मुख खड़ा डाकिया विलाप कर रहा था. सुब्कनें उसके शब्दों के प्रवाह को,  जो किसी दर्द को बे रोक टोक बयां कर जाना चाहते थे रोक रहीं थीं. उसकी सुब्कानों के गिरते उठते चढ़ाव के बीच सुना, सर! आपकी बात लग गयी.

बहुत परेशान करता था आपको और अन्य साथियों को. सब मुझसे डरते थे. आज मैं अपने ही पूर्व के सह विधार्थियों के घर डाक पहुंचाता हूँ . उनके दरवाजे और फाटक ही अब उनसे मेरे संबंधों की सीमा और मेरी हद हैं. उस हद का परिणाम जो मैं स्कूल में पार करता रहता था, और जिससे आजिज़ आकर आपने कह डाला था,“पढ़ेगा नहीं तो क्या डाकिया बनेगा?” उसकी बातों ने एक अजीब सा कम्पन पैदा कर डाला, बाबूजी उसे बैठा कर सांत्वना दे रहे थे, डरा सहमा मैं लौट पड़ा   अपनी पुस्तकों में और उन्ही के बीच अंकित हो चुकी थी एक और चाचा की कहानी जो अब सिर्फ एक डाकिया नहीं था, जिनकी याद  और उनके  साथ किये  गए  हमारी  स्मृतिपटल पर अंकित  शरारतों का वह सिलसिला, जिन्हें अब  जीवन भर, हमें  टीसते रहना था.

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