मंदिरों में लिंग भेद क्यों जब सारा जगत जिस ब्रह्म पर अध्यस्त है उस ब्रह्म में ही लिंग निर्देशन नहीं? अगर वेदांत का ध्येय विषय ब्रह्म है जिसका अनुभव द्वैत, अद्वैत, कर्म, भक्ति एवम ज्ञान तीनो मार्गों से सुलभ है, फिर इन मार्गों पर निर्बाध आवागमन बाधित क्यों? नारायण की मानवीय परिकल्पना “चतुर्भुज,” अगर ब्रह्म की चार नश्वर उपाधियों अहंकार, बुद्धि, मन, और इन्द्रियों में एक मानवीय अभिव्यक्ति मात्र का सुन्दर चित्रण है, फिर इस दृष्टिकोण से भी ऐसा भेद युक्तिसंगत तो नहीं ?
उपनिषद गुरु शिष्य धैर्य परमपरा का एक अद्भुत
उधाहरण है जहाँ शिष्यों को अधिकार प्रदत
है की वे अपने अन्तः में उठते प्रश्नों का
अपने गुरु के धैर्य और अनुकम्पा में उत्तर
ढूंढें और प्राप्त करे. गुरु के धैर्य और उनकी अनवरत उप्ल्भ्धता में ही गुरुत्व की
परीक्षा निहित है. अगर प्रश्न उठे है तो उनके युक्तिसंगत उत्तर ही इस इस नारीशक्ति
की उत्तेजना का निदान हो सकते हैं. शिष्य के सहस्त्रों उठते प्रश्न और इनके
सहस्त्र उत्तरों में ही उपनिषद का दर्शन व्याप्त है. फिर पंडितो का ऐसा हठाग्रह
क्यों ?
इस नवद्वार युक्त मानव दुर्ग के सात द्वार इसके प्रकाशक हैं. इन्ही द्वारों से
मनुष्य जो ब्रह्म की अहंकार, बुद्धि, मन और इन्द्रियों से तादात्म्य अभिव्यक्ति है,
इस दुर्ग का बाहरी विषयों से अपने प्रकाश में शाक्शात्कार कराते हैं.
शेष दो द्वार मल के उत्सर्जक या जनेन्द्रिय
हैं. फिर इस दृष्टिकोण से भी स्त्रियों के मंदिर प्रवेश पर ऐसी वर्जना क्यों? यदि
“भगवद दर्शन से” तत त्वम् असी और “ब्रह्मैक्य” ही अभिप्रेत है तो देव या उसके
आश्रय से नारी वंचित क्यों ?
नवद्वार रुपी मानव के नश्वर उपाधिकरण की दृष्टि
से यदि पुरुष और नारी सामान हैं तो फिर उसके साथ असमानता का व्यवहार क्यों? यदि
पुरुष और स्त्री उसी ब्रह्मचेतना से अभिभूत हैं तो फिर यह भेद क्यों? इस मिथ्या
आचरण का जो कारक है वह पोंगे पांडित्य और ब्रह्म में स्थित ज्ञानी अर्थात ब्राह्मण
में भेद है, और नारी का अपमान.
अगर गंगा शिव के शीर्ष पर अध्यस्त है और
शिवसागर में उसका महाप्रयाण और बार बार पुनर्जन्म अविरल तो फिर ज्ञान गंगा के बहाव
और करुणासागर में उसके समर्पण भावना का ऐसा विरोध क्यों? इन अविरल धाराओं के मार्ग में ऐसी ज्ञानशून्य, मानवरचित बाधाओं का उत्पन्न होना ऐसे प्रलय की चेतावनी है
जो अपने शक्तिवेग से मंदिरों को भी अपने धाराओं के बहाव में ले लेती हैं फिर शिव
को भी अपने बाल रूप में अवतरित होकर पार्वती से विनति करनी पड़ती है और उसकी उग्रता
का हल ढूँढने को विवश होना पड़ता है.
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