एक हास्य कलाकार को अपने
अभिनय परायणता का पारितोषिक मिला . जो, कुछ पल भूखों को हँसाने की सलाहियत रखता था
वह कैद हुआ, जो रुला रहे हैं वह ब्रह्मज्ञानी अपने अपने हास्यास्पद तरीकों से मानव सेवा मेगे हैं. अजीब विडम्बना है इस
व्यवस्था की और इसके दोहरे मापदंडों की. जुमलों की हास्यास्पद जुमलेबाजी करने
वाले,राजनीतिक पटल के अभिनयकर्ता, धार्मिक पटल पर आध्यात्म को समोसे और पकौड़े बनाने वाले, हांथियों को अपनी उर्जा शक्ति से
उठा फेंकने वाले, नग्न बहनों के बीच अपने तथाकथित भजनों से आध्यात्म को
पुनारुप्देषित करने वाले, शोषक को पोषित करने वाले और उसी से पोषित होने वाले,
उपेक्षितों की अपेक्षाओं की प्रवंचना करने वाले,आज मकर संक्रांत के दिन अपने
धागों से अपने स्वार्थ की पतंगे उड़ा रहे हैं, एक कलाकार कैद हुआ और भारत
मौन रहा.
वो जिन्हें दिन में कभी
कभार रोने से फुरसत पाने के लिए, हास्य कला की अभिव्यक्ति के भोग की जरूरत पड़ती है उन्हें अपने मौन धर्म से
ज्यादा कुछ आता भी नहीं. क्यों की यह हाँथ कटी प्रजा है जो पांच वर्षों में एक ही बार अपने मत को प्रकट करती है, उस चकाचौंध के वशीभूत, जो
वर्षो उन्ही की वंचना से पोषित होती है, जिससे बनता है राजनीतिक साम्राज्यकभी
इनका, कभी उनका, जिनकी निज निधियां सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर, अक्षुण है .
इस लिए आज जब अवसर आया एक हास्य कलाकार, और एक
हास्यास्पद खुद की खुदाई करने वाले व्यापारी के बीच चुनाव की, एक गरीब कलाकार न्याय की तुला पर हल्का पड़ गया.
उसके पास कहाँ थे, कभी भी, इतने पैसे की वह
इन तथाकथित जनसेवकों और उनके
दलों को सामर्थ्यवान बना पाता कि वे उसके
अभिनय का आनंद उठा पाते? उसके समर्थन में हो पाते?कैसे समझ पाता कोई उस हंसाने
वाले के हास्य में छुपे दर्द का, उन
प्रश्नों का, जो खुद में, व्यवस्था पर उठ रहे इन प्रश्नों की कलात्मक अभिव्यक्ति है. प्रश्न उठना
लाजमी है कि “ ड्रामाबाजों " की इस नवसंस्कृति में इस उभरते कला शैली पर ही यह
प्रहार क्यों?
जब तक यह लेन देन की राजनीती शुचिताशून्य रहेगी. जब
तक दान की और दानियों की जानकारी और उनकी
पात्रता अघोषित रहेगी जब तक इन राजनीतिक दानों की शर्तें गुप्त रहेंगी, जब तक राजनीती
में गंदे धन का किरदार बना रहेगा और राजनीतिक दल इससे पोषित होते रहेंगे. राष्ट्र और
उससे जुडी व्यवस्थाएं और संस्थाएं, अवान्छितों के दबाव में नजर आएँगी, राजनीति
और शाशन व्यवस्था हास्यास्पद बनी रहेंगी, हास्य की प्रेरणास्रोत बनी रहेगी. ये और
बात है की कॉमेडी कभी भौंडी भी नज़र आएगी क्योंकि वह देश और काल की बनती बिगडती
परम्पराओं की ही तस्वीर होगी, हसने वालों की संख्या बढ़ेगी साथ बढ़ेंगे हसने वाले भी. क्या कारागृह ठहाकों को लगवाने और लगाने वालों को कैद कर सकेंगे?
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