पश्चिम बंगाल का मालदा अशांत है, अज्ञानियों के
इस टकराव ने अधर्म आधारित राजनीती को अवसर प्रदान कर दिए . सुब्रामनियम स्वामी राममय हो चले और
आज़म साहिब ने अपने धार्मिक दीवालियेपन की हद ही पार कर दी. स्वामीजी महाभारत की बात कर रहे हैं तो आज़म साहिब अपने
बयानों से उत्तरप्रदेश में आसीन चुनाव के मद्देनज़र इस नासमझ तीरंदाजी में बढ़त
बनाने की जुगत में हैं. ऐसी पृष्ठभूमि में चलाना है एक राष्ट्रीय कार्यक्रम “ मेक
इन इंडिया”.
हालिया दशकों में धर्म पर बहुत चर्चा हुई है पर
चर्चा कुछ ऐसी की वह धर्म की सारी
मर्यादाओं का उल्लंघन करती रहीं. चिन्तक हाशिये पर चले गए और नेता एक
नए चिंतन की स्थापना करते रहे. द्वन्द का दौर कुछ ऐसा चला की वह विक्षिप्तता को
प्राप्त हो गया. मन की बातें कुछ ऐसी हो चलीं की मूढ़ मतान्धता ने बुद्धिमता को
अपने रचे दीवारों में कैद कर लिया “ जय श्री राम” के नारे कुछ इस विकृत रूप में
लगाये जाने लगे की मुस्लिम और अन्य धर्मावलम्बियों के बच्चे डरने लगे , इस्लाम को
कुछ इस तरह स्थापित किया जाने लगा की और ऐसे ऐसे उद्घोष होने लगे कि हिन्दुओं के बच्चे डरने लगे . करुणासागर
की इस तरह की विकृत वंदना और इबादत, करुणा और सहिष्णुता
विहीन होती चली गयी . बोलने की आजादी जाती रही ,सोचना भी भय के साए में दुर्लभ होता चला गया . हमारे धर्म ही हमें क्यों डराने या हमसे एक दूसरे की हत्या करवाने लगा . मैंने तो ऐसी नसीहत किसी भी
धार्मिक किताब में नहीं पाई. राम तो
मर्यादा पुरषोत्तम थे ,करुणा के सागर थे ,उन्होंने किसे और कब हिंदुत्व की ठेकेदारी दे दी और किस ओसामा और
बघदादी को अल्लाह ने यह जिम्मेवारी सौंपी?
हिन्दू दर्शन में ‘ धर्म ‘ शब्द का व्यापक अर्थ है जिसका तुल्य
शब्द किसी अन्य भाषा में दुर्लभ है. इस शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘धृ ‘धातु से
हुई है .जिसका अर्थ है ‘धारण करना’. अतः धर्म शब्द का अर्थ हुआ –‘” जिसके
द्वारा कोई वस्तु पूर्ण रूप में धारण की हुई रहती है.” प्रश्न उठता है की
कौन कौन से धर्मावलम्बी आपने अपने धर्मों और इनसे अनुप्राणित और अनुशाषित अपने आत्मस्वरूप
की वस्तुता पर कायम हैं ?
साधारणतः धर्म शब्द का उपयोग धार्मिक विधि,
नैतिक नियम, कर्तव्य,दान आदि अर्थों में किया जाता है जो साध्य तक पहुँचने के साधन
हैं .परन्तु संस्कृत का मूल शब्द एक विशेष अर्थ रखता है ,जिसका तात्पर्य किसी एक
अर्थ के द्वारा स्पष्ट नहीं होता है. सबसे अच्छी
परिभाषा जो अबतक देखने को मिली है,उसके अनुसार ,” धर्म वह है जिससे वस्तु का वस्तुत्व
सिद्ध होता है.” उदाहरणार्थ , अग्नि का धर्म उष्णता है और सूर्य का धर्म प्रकाश है
. उष्णता के बिना अग्नि का अग्नित्व और प्रकाश के बिना सूर्य का सूर्यत्व सिद्ध
नहीं हो सकता.
अतः यह स्पष्ट है कि धर्म शब्द से केवल साधुता या नैतिकता ही अभिप्रेत नहीं,यह
शब्द वस्तु के मूल स्वरुप का संकेतक है, जिसके बिना उस वस्तु का स्वतंत्र अस्तित्व ही संभव नहीं. उदाहरनार्थ यदि सोनिया जी वास्तव में उस दल की
नायिका हैं जिसका धर्म ही धार्मिक सहिष्णुता है तो वे गोधरा काण्ड के तत्काल बाद
उसकी भर्त्सना कर रही होतीं जैसा की उन्होंने नहीं किया, दिखीं तब जब गुजरात में
दंगे भड़क चुके थे और वे इस दंगे के विरोध
में एक विरोध यात्रा का हिस्सा बनी. तदुपरांत उससे सम्बंधित जांच की जो लीपापोती हुई
वह भी सहिष्णुता का संकेतक तो नहीं था.
ठीक उसी तरह मोदीजी को गुजरात नरसंहार के मध्य एक विवश प्रधान मंत्री का उनसे राज
धर्म निभाने का आव्हान करने की विवशता भी मोदी जी के धार्मिक सहिष्णु होने पर
प्रश्चिन्ह था .इस दृष्टिकोण से न तो
सोनिया जी और न ही मोदी जी अपने अपने वस्तुत्व को अक्षुण रख पाए. ये दोनों के ही तत आचरण अधार्मिक दिखे और जिस न्यायधीश ने गोधरा जांच की
लीपापोती की वे भी न्याय की वस्तुता को अक्षुण रखने में नाकामयाब दिखे.
मैं भी एक हिन्दू हूँ और पेशे से एक किसान.
अपने शुद्ध आत्मस्वरूप के ज्ञान के लिए तीनो आध्यात्मिक मार्गों , भक्ति, कर्म और ज्ञान
, कुरान और बाइबिल, राष्ट्रपिता गाँधी के सत्य के आग्रह , उनकी अहिंसा में आस्था
और उनके एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ, को इस
यात्रा में अपना अद्वितीय निर्देशक और प्रेरणास्रोत मानता हूँ. . इन सारे मतों को मैंने उन सरिताओं के सामान जाना जो सबका पोषण
करते हुए लगातार सागर में समाहित होती जाती और फिर वाष्प बन पृथ्वी पर वर्षा करती
हैं और इस तरह मैं पुनर्जीवन की अवधारणा को भी समझ पाया. मैंने सागर को किसी
भी सरिता से परहेज करते नहीं पाया और नाही
प्रकृति की किसी भी निधि को धर्मो और धर्माविलाम्बियों में भेद भाव करते देखा .
एक किसान के नाते मैं कर्म फल को समझ पाता हूँ
. मैंने जो बीज पूर्व में बोये थे, उनकी उपज मैं आज काट रहा हूँ , मैं आज जो बीज बोऊंगा उसे ही कल काटूँगा. आज विश्व तथा
राष्ट्रीय पटल पर जो असहिष्णुता और कट्टरवादिता मानवता को दूषित कर रही है उसका बीजारोपण पूर्व में हुआ था
,प्रतिफल आज प्रत्यक्ष है. देश और विश्व में इन सन्दर्भों में जो कुछ भी हो रहा है
वो पूर्व के ही कुछ स्वार्थी चुनावों का प्रतिफल है. अब समय है की सच्चे धर्मगुरु
अपनी अपनी ज्ञान सरिताओं के आचमन से
अज्ञान के आवरण को धो , मानवजन का कल्याण करें . समय है एक ओर, व्यवसायी धर्मगुरुओं
की पुश्पितावानी के जाल में जकड़े पीड़ित समाज को बचाने की, तो दूसरी ओर कट्टरवादिता के द्वारा उसी सागर को दूषित कर रहे लोगों को रोकने की, जो एक ही
सर्वशक्तिमान की तथाकथित वंदना में उसके भक्तों को भटकाने में लगे हैं.
कर्म ही धर्म है और कर्म ही अधर्म. ईश्वरार्पण
की भावना से किये कर्म ही कर्म और उन कर्मों का समूह ही सदाचरण. अगर गीता में
मारने की बात है तो वह अपने अन्तः के
अधार्मिक सोच और उनसे प्रेरित दुष्कर्मों के अंत का आह्वान है न की कानून को अपने
हाँथ में ले, अराजकता में लीन होने की. सारे दल जनता जनार्दन की बात करते हैं पर क्या उनके
कृत इश्वर को अर्पित किये जा सकते हैं. एक प्रजातान्त्रिक राष्ट्र में चिन्तक आज
आंदोलित क्यों हैं ? क्या इसके लिए सिर्फ मोदी जी जिम्मेवार है या की यह भी स्वीकारने
की जरूरत है की तुष्टिकरण की कांग्रेसी
नीति इसकी बुनियाद है. और यही कारण बना हिन्दू सहिष्णुता की बलि चढ़ने का . न
सारे हिन्दू असहिष्णु थे और न ही मुसलमान और ना ही कोई और, अगर असहिष्णुता किसी ने प्रचारित
प्रसारित की तो सर्व प्रथम ऐसा कुछ अति उत्साही
कांग्रेसी नेताओं ने मुसलमानों को अपनी ओर
बनाये रखने के लिए, जिसके फलस्वरूप हिन्दू
भावनाएं कांग्रेस के खिलाफ बनती चली गयीं और एक नया चिंतन पहले आर एस एस , फिर
उससे जनसंघ और फिर बी जे पी के रूप में प्रकट हुआ.
यह कैसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था बनती चली गयी ?
कांग्रेस में परिवारवाद घर कर गया और बी जे पी में एकाधिकार . सारे प्रजातांत्रिक
संगठन धरे धराये रह गए . संविधान अपमानित हुआ , प्रजातंत्र कुलषित. ह्रदय को आघात
पहुंचा था जब एक कांग्रेसी बुद्धिजीवी ने अपनी कुत्सित उच्चता के परिणाम स्वरुप मोदीजी को “चायवाला” कहा था और इस एक अमर्यादित
वक्तव्य ने मोदीजी का जन्ता जनार्दन ही नहीं वरण बहुतायत कांग्रेसियों के साथ एकाकार करा दिया पर दुःख तब हुआ जब बिहार
में मोदी जी अपना मनः और वाणी सैंयम खो
बैठे. जनता जनार्दन को उनका यह आचरण प्रधानमंत्री निष्ट नहीं लगा. एक बार इस
राष्ट्र को कुछ अंग्रेजों ने बांटा
तदुपरांत कुछ कांग्रेसी, कुछ जनसंघी और
बाद में कुछ भाजपाई इसे अपने अपने तरीकों
से अपने अपने राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के
लिए बांटते रहे. हमारा संविधान ही हमारी पहचान है ,इसके मूल्य हमारे आचरण के
मार्गदर्शक, इसमें हमारी आस्था ही हमारा मानवोचित, अनुशाषित और इससे अनुप्राणित ,
राष्ट्रोचित धर्म हो सकता है.
कांग्रेस का इतिहास संगठित स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास से जुड़ा है . इस
मायने में यह दल और इसका मौलिक चिंतन राष्ट्रीय विरासत है . जिस तरह किसी दल विशेष
को इसकी अहम्यियत से खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है वैसे ही यह प्रश्न
उठाना भी लाजमी है की क्या कांग्रेस सोनिया जी और राहुल के नेतृत्व में अपनी अहमियत और अपनी
राष्ट्रीय विरासती अस्तित्व को बनाए रख पायेगी. ऐसी क्षमता से ये विहीन दिखने पर
भी किस तरह और क्यों अपने आत्मघाती हठ पर कायम है. कांग्रेस को अपने कद और
अपनी वर्तमान और दीर्घ कालिक अस्तित्व के लिए संजीदा चिंतन की आवशयकता है .
पार्टी को सोनिया जी का सम्मान करना चाहिए , राहुल से
इंदिराजी और राजीव जी का वंशज होने के नाते स्नेह और सहानुभूति भी रखना चाहिए
पर ठीक उसी तरह जिस तरह देश के लिए
शहीद होते हर नौजवान सैनिक और उनके परिजन के लिए सम्मान,
सहानुभूति और शुभकामना तर्कसंगत है पर हर शहीद जवान का वारिस क्या सिर्फ भावनावश देश का सेनाध्यक्ष बनाया जा सकता है? एक
ऐतिहासिक राष्ट्रीय धरोहर पर एक
परिवार्विशेष का अधिपत्य क्या किसी भी
दृष्टिकोण से धार्मिक है? इसे धर्म के
दृष्टिकोण से चोरी ही कहा जा सकता है . नेतृत्व एक क्षमता है न की हठी उत्तराधिकार
जिससे कांग्रेस को अप्रत्याशित क्षति हुई है और होती रहेगी. अंध श्रधा किसी भी
दृष्टिकोण से विवेक निष्ठता का संकेतक नहीं.
सोनियाजी और राहुल में काग्रेस के लिए नेतृत्व
क्षमता देखना परमपरानिष्ट और भावनानिष्ट हो सकता है पर यह किसी भी तरह बुद्धिनिष्ट तो
नहीं, पूछें कांग्रेसी अपनी अंतरात्मा से
की क्या इन दोनों में नेतृत्व क्षमता है और क्या उनमे वह गुण देखना जो उनमें है ही नहीं,
विवेक्निष्ट है और क्या ऐसी चाटुकारिता का
त्याग करना कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक विरासत को संजोय रखने,उसको अक्षुण रखने की बहुत
बड़ी कीमत होगी? क्या कांग्रेस जो एक राष्ट्रीय धरोहर है ,उसे किसी की निजी सम्पति
बन्ने दिया जा सकता है? क्या राष्ट्र को एक ऐतिहासिक सनातन दल को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता नहीं
ताकि वह आज एक जिम्मेवार विपक्ष और कल सरकार की भूमिका निभा सके . अगर कांग्रेस को
अकबर रोड की काल कोठरी से बाहर निकालना संभव नहीं तो क्या सोयी हुई कांग्रेस को उस
काल कोठरी से बाहर उससे अलग ढूँढा, जगाया और पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता जो
परिवारवाद से ऊपर उठ राष्ट्रवाद को समर्पित हो सके और इस तरह अपने पूर्वजों द्वारा
प्रवाहित इस विचारधारा के प्रति अपने धर्म का निर्वाह कर सके.
बी जे पी ने अपने विपक्ष काल में संसद में ना
ना प्रकार के अवरोध खड़े कर संसदीय मर्यदाहरण की नीव रखी, आज कांग्रेस संवैधानिक मूल्यों और आदर्शों को त्याग इस दुराचरण को आगे
बढाने में लगी है. राष्ट्र हथप्रभ है, उसका निर्माण ठहर
गया है .अगर राष्ट्र सेवा ही दलों का लक्ष है तो संसद में यह तू तू मैं मैं का
माहौल क्यों? क्यों अपव्यय होता है राष्ट्रीय निर्माण के चिंतन के लिए आहूत संसद
सत्रों का ? संसद असंसदीय हो चला है तो
क्या इसके लिए सिर्फ एक दल जिम्मेवार है ? राहुल भी एक सांसद हैं , चुन कर आये हैं
क्या बी जे पी के एक शीर्ष नेता द्वारा उनको संसद में “ पप्पू “ कहकर पुकारना संसदीय आचरण का परिचायक है? संसद में जो कुछ होता रहा है क्या वह संसदीय वस्तुता ,उसके
धर्म के अनुकूल है ? और जो भी संसद की गरिमा को भंग करते हैं वे किस तरह से
बुद्धिनिष्ठ या धर्मनिष्ठ हैं ?
राष्ट्रनीति और राजनीती का धर्म ग्रन्थ हमारा
संविधान है जिसके विधान सबके लिए सम हैं . संविधान की अव्धार्नाओं , इसके
मूल्यों का विरोध और इसकी मौलिकता से खिलवाड़ी आचरण ही सबसे बड़ा अधर्म
है , क्या कभी अलग अलग दल अपने आचरण को
अपने आईन के आयने में देखने की आवश्यकता
समझते हैं. अगर हम अपने संविधान में ही आस्था रखने में नाकामयाब होते रहे तो हम किस तरह खुद को
बुद्धिनिष्ठ और धर्मनिष्ठ कह पाएंगे? धर्म अनुशाशन का स्रोत और उसका पोषक भी है ,अनुशाशन विहीनता ही अधर्म है .
धर्म खुद न तो हिन्दू है न ही मुसलमान न क्रिस्तान या सिख या कोई भी संप्रदाय, धर्म तब
और तब ही हिन्दू , या इस्लामी या क्रिस्तानी या कुछ और दिखेगा जब धर्मावलम्बी अपने अपने धर्मग्रंथों
को सही मायने में समझ, उस पर पर यकीन ला,
एक दूसरे की आस्थाओं के सम्मान के सबसे
मौलिक निर्देश के अनुशाशन में रहना सीख पाएंगे और हिरन खालों और काले सफ़ेद लबादों
में छिपे उन्माद बिखेरते, विध्वंसकारी धर्मगुरुओं से बच सकेंगे.
हमारा राष्ट्र एक स्पंज के सामान है जिसने
कालांतर में सबको खुद में समाहित कर लिया. हम आपस में ऐसे रचे बसे लोग हैं जिनको
एक दूसरे से अलग कर पाने की कोई भी चेष्टा
अल्पकाल के लिए इस राष्ट्र को निचोड़ने की कोशिश हो सकती पर उसकी प्रकृति और उसकी
क्षमताएं उसे पुनः उसके मूल स्वरुप में
वापस ला ही देंगी. ऐसा इस राष्ट्र ने
नब्बे के दशक में अयोध्या के सन्दर्भ में देखा है और यह दृष्टान्त उसके स्मृतिपटल पर
अंकित और अमिट है.
चिन्तक दर्शक होते हैं . अपने चिंतन के दर्शन
को लेखनी से पिरोते हैं. ये दर्शन, दिशाओं का संकेत करते हैं , चिंतन क्रन्तिकारी भी हो सकता है जैसा वर्तमान में हुआ है और अगर
अब बात निकली है तो दूर तलक जाएगी , लोग बहुत सी बातों का सबब पूछेंगे , नेता इन
दार्शनिकों के दर्शन में दिशाएं ढूँढेंगे और राष्ट्र को राष्ट्र के लिए अक्षुण रख
पाने की जुगत में लगेंगे.
देश
महानता को अवश्य प्राप्त होगा क्योंकि
इसका युवा वर्ग बुद्धिनिष्ठ है वह चाटुकारिता
से परहेज़ करता है , व्यक्तियों और प्रतिभाओं में फर्क करता है, वह किसी को स्थापित कर सकता है तो उसे उखाड़ फेकने
की भी क्षमता रखता है. वह सोनिया जी और राहुल की बौधिक एवम नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न करता है वह मोदी जी के भी बीते एक तिहाई कार्यकाल में एक ही स्थान पर
रुके प्रगति रथ से विचलित है और आने वाले समय में अपने अन्तः में उठते प्रश्नों का उत्तर जरूर
ढूंढ लेगा . सब, खासकर मोदी, जी भली भांति जानते हैं की आज भारत एक युवा बहुल
राष्ट्र है और इसकी शक्तियों की संभावनाएं
असीम हैं जो इस राष्ट्र की दिशा और दशा को जरूर बदल पाएंगी.
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