यह स्मृति उन दिनों की है जब मैं कैशोर्य को
प्राप्त हो रहा था और ग्यारहवी कक्षा का विध्यार्थी था. पटना के बेली रोड जिसे बाद
में सम्पूर्ण क्रांति चौक कहा जाने लगा, उच्च सरकारी अफसरों का रिहायशी ठिकाना हुआ
करता था. जिस सरकारी कोठी के पहले तल्ले पर हमारा निवास था उसकी बालकोनी नजर को क्रांति चौक पर उन रिक्शों और उनको चलाने वालों पर खींच
ले जाती जिस पर उनका तात्कालिक, अस्थायी निवास था. तीन पहियों वाले ये रिक्शे ही गाँव से
शहर की चकाचौंध की ओर मुखातिब इन इंसानों का ठिकाना था. इनके रिक्शों की गद्दियाँ ही इनके बिस्तर थे और इनके साथी मक्खी और मछर जिन्हें ये सोते
जागते अपने गमछों से हांकते रहते. जाग रहे
होते तो
इनकी आँखें सवारियों की बाट जोहतीं, नींद इन्हें जागने नहीं देती और कभी गर्मी कभी ठण्ड, कभी तपती लू तो कभी भीषण
बरसात इन्हें सोने नहीं देतीं.
राष्ट्र अपनी आज़ादी की पंचीसवी वर्षगाँठ मना
चुका था और चौक आदोलनों का तारीखी स्थान बनता जा रहा था. इंदिरा
सरकार के खिलाफ जय प्रकाश बाबू के इर्द गिर्द आन्दोलनकारी शक्तियां एकजुट हो रहीं
थी. इन रिक्शों पर सभी दलों के सफ़ेद खद्दरधारी रसूखदार सवारी करते थे ,इनका समाजवाद और सामाजिक
न्याय कुछ ऐसा था की अगर ये रिक्शे वाले
मौन तोड़ अपने कठोर श्रम का उचित पारिश्रमिक मांगने की जुर्रत कर बैठते तो आगे की
बात उन रसूखदारों के जूते और चप्पल करते.
इन्ही
रिक्शा चालकों में एक था पारस. था तो रिक्शाचालक पर अदब ऐसी की शहरी शिष्टता भी फीकी पड़ जाये. पारस मेरे परिवार के सदस्यों
को अपने रिक्शे से इधर उधर ले जाया करता था और धीरे धीरे परिवार का स्नेह पात्र बन
गया. उसके, हमसे सम्बन्ध कुछ ज्यादा ही
गहरे हो गए. कभी भी, कहीं भी, और किसी भी वक्त जाना हो पारस सदा तैयार और उसकी
खिदमत्दारी हर बार दिल को स्पर्श कर जाने वाली होती .पारस कुछ इस तरह अपना हो चला
की उसकी हर तकलीफ मुझे झगझोर डालती. अम्मा की नज़र भी खिड़की के उस पार चौक
निहार रही होती जब वो हम भाई बहनों
को खाना खिला रही होतीं और फिर जब थका हारा पारस उन्हें दिखाई पड़ जाता तो हर्ष से
चिल्लातीं ,” पारस आ गया “, मानों पारस उनका अपना ही बेटा हो और फिर लग जातीं उसे
खाना परोसने में. खाना खाते वक्त पारस और अम्मा के बीच नजरों ही नजरों में करुना
का जो लेन देन होता वह और भी हृदयस्पर्शी
होता.
एक दिन जब मैं स्कूल से लौटा तो पारस को बहुत
उदास पाया, उसके पिता गाँव से पटना आये थे. मैंने उन्हें देखा, क्षय को प्राप्त
होता उनका पिंजर अपनी ही कहानी बयान कर रहा था. मैं समझ सका की पारस को किन विवशताओं
ने शहर की ओर धकेला होगा. मैं पारस और
उसके पिता को चौक पर ही छोड़ घर में प्रवेश कर गया.पारस और उसके पिता के चेहरे पर खिंची तनाव की लकीरें
मेरे मानस को अपने गिरफ्त में लेती गयीं. मैं बालकोनी पर जा बैठा और वहां से कुछ
दूर बाप बेटे को सर झुकाए किसी विषम समस्या से घिरा पाया. मन उनके मध्य से हट ही
नहीं पाता, बीच बीच में इस रस्साकशी में बाबूजी की आवाज़ “ पढाई क्यों नहीं हो रही
? “ तनाव को बढ़ा डालती.
मुझे
इंतज़ार था पिताजी के उनके अपने शयन कक्ष
में प्रवेश करने का. वो जल्दी उठते और जल्द ही सोते थे और आज भी समय पर ही सोते पर
इसमें विलम्ब न होते हुए भी समय कुछ ठहरा सा नज़र आ रहा था. अंततः वे सो गए और मैं
बिना आहटों के पहुँच गया पारस और उसके पिता के पास. पारस हैरान था, रात गए मैं
कैसे पहुंचा बाबूजी से बचते बचाते उसके पास. वह मुझसे अपनी परेशानी का कारण छुपा
रहा था पर मैं उसका पीछा नहीं छोड़ रहा था. मेरे आग्रह ने उसके पिता को तोड़ दिया वह
वृद्ध बिलख पड़ा उसका दर्द पाषाण को भेदने की क्षमता रखता था पर गाँव के महाजन की
क्रूरता किसी पाषाण से भी कठोर थी और राष्ट्र इस कुप्रथा से अभी अपना पीछा नहीं
छुड़ा पाया था.
उन दिनों धनाढ्य लोगों की बेटियों की शादी का बजट कोई दस से
पंद्रह हज़ार रूपए हुआ करता था. पारस और उसके पिता ने महाजन से जो ऋण लिया था, सूद समेत पचीस सौ
रूपये हो गया था और महाजन उसके बैल,
दरवाजे, घर के सामान इत्यादि खोल ले जाने
पर आमादा था. इतने पैसे पारस कहाँ से जुटा पाता , समझ से परे था. इस समस्या का
निदान तो मुझे भी नहीं सूझ रहा था पर फिर
भी अनायास चिंता मत करो, ऐसा कह मैं घर लौट आया. सारी रात
नींद नहीं आयी. सबेरा हुआ मैं बस्ता उठा
स्कूल के लिए निकल पडा और दूर एक स्थान पर
बैठ कर पिता जी के दफ्तर जाने का इंतज़ार करने लगा.
उनका
अनुशाशन बहुत ही कठोर था और कोई भी कारण अनुशासन को खंडित करने के लिए काफी नहीं हो सकता था ,जैसे ही बाबूजी के दफ्तर
जाने का वक्त निकल चला मैं निराश मन से घर की ओर लौट पड़ा.अम्मा ने पूछा मैं स्कूल से इतनी जल्दी कैसे लौट आया. मैं चुप
रहा .अम्मा बार बार मेरे पास लौटतीं और
तरह तरह से मुझसे स्कूल से इस तरह वापस लौटने का कारण पूछतीं पर मैं अपना मौन
तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता.
मेरी
अम्मा नाम और कर्म दोनों से सावित्री थीं .सागर उनकी करुणा को समा पाने में अक्षम
था और माँ शब्द की संवेदनाएं और उसका अर्थ मैंने उनसे जाना. आदर्श ऐसे की उनके
कठोर तपि जीवन की तप की अग्नि भी उनके आदर्शों
की उष्णता को न झेल पातीं. अब एक महाभारती
मिथ्या “अश्वथामा हतो, नरों न कुंजरो” जैसी ही कोई मिथ्या का प्रयोग ही शायद पारस
और उसके पिता की पीड़ा को कम करवा सकती थी. पर क्या उस करुणामयी देवी से ऐसा
मिथ्याचार करना उचित था ? क्या उसके द्वारा अनुप्राणित आदर्शों की हत्या से ही मैं
अपने तात्कालिक लक्ष को प्राप्त कर सकता था? क्या सत्य के आग्रह से पारस और उसके
पिता की मदद नहीं की जा सकती थी? मेरी अपरिपक्वता ने मुझे अपनी माँ को आंकने में
गलती करवा डाली .
मैंने
झूठ बोला , “ अम्मा स्कूल के लैब में मुझसे एक उपकरण टूट गया , अगर मैंने पचीस सौ
रूपये न भरे तो मुझे परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाएगा. अम्मा गश खा गयीं पर खुद
को सम्हाला . अपने संदूक को खोल छोटी छोटी
गठरियों को खोलने और उनमे कुछ तलाशने लगीं फिर फ़ोन उठाया और बनारस मेरे नाना को फ़ोन लगाया
. वृद्ध नानाजी ने दूसरे ही दिन अम्मा को पैसे भेज दिए.अम्मा और मैंने इन बातों को
किसी पर प्रकट नहीं किया. अगले दिन मैं स्कूल के लिए निकला ,पारस से कहा ,आज मैं
तुम्हारे रिक्शे से स्कूल जाऊँगा .पारस ने मुझे अपने रिक्शा पर बैठा लिया. कुछ दूर
आगे जा कर मैंने पैसे पारस को देना चाहा पर वह मेरे हाथ में इतने पैसे देख कर डर गया.
.महाजन
की चिंता से बड़ी, अब उसकी जिज्ञासा थी, जो जानने को उत्सुक थी, की कहीं मैंने कुछ
गलत तो नहीं कर डाला. मैंने गोपनीयता की शपथ दिला कर पारस को सारी बात सच सच बता
डाली. मैंने पारस को पैसे देकर गाँव जाने को कहा और खुद वहीँ सड़क किनारे बैठ गया.
.माँ से झूठ बोला था ,उसकी पीड़ा का कारण बना था, उसे नाना से पैसे मंगाने को विवश
कर डाला था, उसे बाबूजी से यह बात छिपाने के लिए मजबूर कर डाला, जो उनके स्वभाव के
विपरीत था. अचानक ध्यान आया पारस कहीं कुछ गड़बड़ न कर बैठे.
.मैं
सरपट घर की ओर हो चला ,दूर से देखा पारस कोठी के नीचे रिक्शा खड़ी कर रहा था .मैं
अवश्यम्भावी को आँक गया और इसके पहले की पारस सीढियां चढ़ दरवाज़े को दस्तक दे बैठता
मैं दोड़ता हुआ उस तक पहुँच गया. मैं जानता था अम्मा से उसकी निकटता और अपनापन उसे
घर तक खींच लाया था. वह कोठी पर क्यों पहुंचा था, बिलकुल स्पष्ट था. वह अम्मा को
सारी बातें बताने पहुंचा था पर ऐसा कर पाता उसके पूर्व ही मैंने उसे रोक लिया और
अगले दो दिनों तक उसे एक भी मौका मिलने न दिया की वह अम्मा से सत्य प्रकट कर पाता.
अंततः पारस लगातार अम्मा से अकेले में बात करने के लिए
प्रयासरत रहा पर मेरी जागरूकता ने उसे इस सम्भावना से वंचित कर रखा और अंततोगत्वा
पारस अम्मा पर इस बात को प्रकट किये बगैर अपने पिता के साथ गाँव चला गया.
इसके
बाद क्या हुआ उसकी खबर हम तक बहुत लम्बे समय तक नहीं पहुंची. मैं वापस अपनी दिनचर्या
में लौट आया. समय बीता बाबूजी ने सरकारी सेवा से अवकाश पाया हम बोरिंग रोड के छोटे
से भाड़े के मकान में चले गए. अब समय तेजी से बीतने लगा पारस की याद कभी ही कभी आती थी वो भी तब जब मैं किसी कारण से पुरानी
सरकारी कोठी की तरफ से गुजरता. इन मौकों पर पारस और उससे सम्बंधित बहुत से प्रश्न व्याकुलता
के कारण बन जाते,पता नहीं वह महाजन के जाल
से निकल पाया था या नहीं ? इस तरह दो वर्ष बीत गए.
एक रोज़ मैं दिन के वक्त यू हीं बालकोनी पर बैठ
नीचे गली को निहार रहा था.यह कोई डेढ़ सौ
मीटर पर मुख्य सड़क से जुडती थी. अचानक मुख्य सड़क से गली में प्रवेश करती एक काया ने ह्रदय में एक परिचित स्पंदन कर डाला ,कहीं वह
वही तो नहीं? ज्यों ज्यों वह काया नजदीक
आती गयी त्यों त्यों हर्ष का बाँध टूटता गया. पारस ही था और बिलकुल स्वस्थ नजर आता
था.इसका अर्थ उसके गाँव पर सब कुशल है मैं
पुकार बैठा पारस भैया और जवाब, चिरपरिचित, पप्पू मालिक ! पारस सरपट सीढियां चढ़ बालकोनी पर आ गया. मैं
हर्ष से चिल्ला उठा ,अम्मा पारस भैया आया है , अम्मा जो इस वक्त चौके में हुआ करती
थीं, कडाही ,चलनी छोड़ तेजी से बालकोनी पर
आ गयीं.अरे कहाँ था तू पारस इतने दिन फिर उसे बैठने को कह सरपट चौके को लौट पड़ीं वापिस लौटीं गुड़ की भैली और पानी के साथ. पारस
अश्रुपूरित नयनों से अम्मा को निहारता रहा और अम्मा भी अपने आंसुओं को ज़प्त न कर
पायीं. बेटा खाना बना रही हूँ, खा कर जाना ,ऐसा कह वह रसोई को लौट पड़ीं.
अब पारस और मैं अकेले थे, वक़्त था अज्ञात भूत
को वर्तमान से जोड़ने का, उस घटनाचक्र के बयान होने का, जिसकी जिज्ञासा हर स्मृति
के पल में टीस दे जाती थी ,क्या हुआ था
पारस और उसके पिता का ,उसके बैलों का , उसके घर और उनमे जमा सामानों का ,क्या
महाजन की गिरफ्त से ये बाहर हो पाए थे ?
हम गाँव गए और महाजन को उसके पैसे चुका डाले. अब समस्या थी की ढाई
हज़ार रूपये जो आपने मुझे दिए थे उसकी अदाएगी की, एक मित्र ने कलकत्ता के बंदरगाह
और उनपर काम करते कामगारों का जिक्र किया
,मैंने अपना थोडा सा सामान बाँधा और बैठ
गया अपने मित्र के साथ कलकत्ता की गाड़ी पर. बंदरगाह पर बोरे ढोने लगा और पैसे जमा
करने लगा. दो वर्षों में मैंने दस हज़ार रूपये जमा कर लिए , ऐसा कह कर पारस ने रुपयों का एक
बंडल मेरे समक्ष रख दिया.
रुपयों
का मैलापन एक अलग कहानी बयान कर रहा था.
किस तरह बोरों के बिस्तर तले, इन्हें सम्हाला गया होगा ? किस तरह इनके चोरी होने
का डर पारस को डराता रहा होगा ? कितना
कष्ट झेला होगा पारस ने इन पैसों को जोड़ने में? बोरा पीछे एक दुअन्नी, न जाने कितने बोरे ढोए होंगे, भूखे
प्यासे इस जीव ने अपनी इमानदारी को बनाए रखने की जद्दोजहद में ?कितना खून ,कितना
पैसा जलाया होगा इन पैसों को हिफाजत से
पालने में, कैसा रहा होगा उस संशय का दंश जिसे अनवरत झेल पारस ने इन पैसों को सुरक्षित रखा होगा ?
रुंधे
गले से मैं चल पड़ा अम्मा के पास चौके की ओर. पारस ने मुझे मोक्ष प्राप्त करने का
अवसर दे डाला था, वक़्त था अम्मा की निष्ठां के सम्मान का ,सत्योद्घाटन का ,असत्य
की बुनियाद पर रचे गए एक धार्मिक कृत के शुद्धिकरण का . चौके में पहुँच मैं अम्मा
से लिपट पड़ा, अम्मा कुछ जान कर भी दो वर्षों तक अनजान बनी रहीं थी , सच, इश्वर से कुछ छुपता नहीं, वह हर विषय का दृष्टा
है. अम्मा मेरे सत्य को जानती थीं, मुझे सांत्वना भरे आलिंगन में ले वापस पारस के
लिए खाना बनाने में लग गयीं. मेरे लाख चौकसी
के बावजूद पारस ने अम्मा को गाँव जाने से पूर्व सारी बात बता डाली
थीं.अम्मा ने तो अपने मौन से पारस को दिया वचन निभाया था. अम्मा अम्मा थीं, पारस
जो पैसे सूद समेत लाया था उसे अम्मा ने उसकी इमानदारी का पारितोषिक बना वापस सौंप
दिया.
समय
मुझे उस शहर से बहुत दूर ले आया ,पारस तो कालांतर में कहीं पीछे छूट गया पर उसकी
ईमानदारी ने ऐसे पत्थर का दर्शन करा डाला जिसे “ पारस” कहते हैं. आज गणतंत्र दिवस
पर समर्पित है यह अनुभव वृतांत पारस जैसों को , जो उसी की तरह समारोहों की चकाचौंध
से दूर और नेताओं के भाषणों के शोर में
अपना मौन बनाये, अमीरों का बोझ ढो रहे होंगे और राष्ट्र की
महानता को ढूंढते होंगे.