Friday, 11 August 2017

Salok6226:                    3. मुस्लिम लीग और विभाजन भार...

Salok6226:

                   3. मुस्लिम लीग और विभाजन
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:                     3. मुस्लिम लीग और विभाजन भारतीय रास्ट्रीय कांग्रेस स्थापना ने तत्काल ही मुसलमानों में प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी...


                   3. मुस्लिम लीग और विभाजन

भारतीय रास्ट्रीय कांग्रेस स्थापना ने तत्काल ही मुसलमानों में प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी. सर सय्यद अहमद खान जो पेशे से एक न्यायधीश थे और जिन्होंने 1875 में, अलीगढ में मुहम्मदन एंग्लो ओरिएण्टल कालेज की स्थापना की थी, कांग्रेस को एक शिक्षित हिन्दुओं की पार्टी मानते थे जिसपर वो हिन्दुओं की वर्चस्वता   देखते  थे. मुसलमान हिन्दुओं की तुलना में अंगरेजी शिक्षा पाने में पिछड़े हुए थे और इस कारण वे कांग्रेस में खुद को अलग थलग महसूस करते थे. सर सय्यद अहमद मुसलमान को एक अलग कौम मानते थे जिनकी अपनी पहचान और रुचियाँ थीं और उनका मानना था की  अंग्रेजों से बेहतर सम्बन्ध कायम कर मुसलमान बेहतर लाभ उठा सकते थे. उनकी समझ से कांग्रेस में रहना मुसलमानों के लिए घाटे का सौदा था.यह पहली बार था की सय्यद अहमद की जुबान से हिन्दुस्तान में  मुसलामानों की कौम की दृष्टी से अलग होने की बात साफ शब्दों में प्रकट हुई . और शायद यही वो चिंगारी थी जिसे हिन्दू भावनाओं को धीरे धीरे भड़काना था.

मद्रास में बुलाये गए एक कांग्रेसी सभा में मुसलमान नवाबों और रईसों और बदरुद्दीन की कांग्रेसियों के बीच मौजूदगी से नाराज़ सर सय्यद अहमद खान ने मेरठ में मार्च 1888 में एक बहुत ही भड़काऊ भाषण दिया, उनके  भाषण  में हिन्दुओं के प्रती एक नफरत भरे संशय की झलक थी. उन्होंने अशिक्षित मुसलमानों का बर्तानी शासन के अधीन रहना किसी भी हिन्दू बहुल शासन व्यवस्था  के अधीन रहने से बेहतर माना तब तक, जबतक मुसलमान अपनी शिक्षा के स्तर को हिदुओं के समकक्ष नही ले आ पाते. वे मुसलमानों को एक अलग कौम मानते थे जिसने 700 वर्षों तक इस हिन्दू बहुल राष्ट्र को अपने अधीन रखा था. उनकी समझ में अंग्रेज जो किसी दृष्टीकोन से एक ही किताब के मुसलमानों के भाई थे, उनके शासन में रहना मुसलमानों के लिए हिन्दू बहुल किसी भी व्यवस्था के अधीन रहने से कहीं अधिक सम्मानजनक था. वे मुसलामानों को अंग्रेजों के साथ बेहतर संबंधों की स्थापना की बात कर रहे थे और कांग्रेसियों की अंग्रेज शासकों से देश की शासन व्यवस्था में भारतीय प्रतिनिधित्व की मांग  का कट्टर विरोध कर रहे थे . उनका कहना था की किसी भी हारी हुई कौम का विजयी कौम से किसी भी तरह के प्रतिनिधित्व की अपेक्षा करना एक जुल्म था और इस तरह वह कांग्रेसियों के बर्तानी शासन में किसी भी तरह की भागीदारी की मांग को सिरे से खारिज कर रहे थे .हिन्दू बहुल व्यवस्था का भाग या उसके अधीन रहने से बेहतर वो ऐसे बर्तानी शासन के पक्षधर थे, जिसका भले ही कभी भी अंत न हो और भले ही वह हमेशा के लिए इस राष्ट्र पर काबिज रहे.

अक्टूबर 1906 , देश के 35 धनी मुसलमानों ने वाइसराय लार्ड मिन्टो से मिलकर मुसलमानों की हित की बातें कीं. उन्होंने बर्तानी सरकार से हिन्दु बहुमत के तथाकथित असहिष्णु व्यवहार के खिलाफ मदद मांगी. लार्ड मिनटों  ने उनका स्वागत किया और आश्वासन दिया की बर्तानी सरकार हर हालत में मुसलमानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करेगी. चुंकि बर्तानी सरकार भारतियों को शासन में  थोड़ी बहुत भागीदारी देने का मन बना चुकी थी इसलिए इस प्रतिनिधीमंडल ने इस वक़्त मिन्टो से मिलना अनुकूल समझा और इस तरह मुसलमानों का कांग्रेसी विरोधी रवैया अब स्पष्ट होने लगा था वे ऐसा मानने लगे थे की कांग्रेस के दबाव में लोकशासन और व्यवस्था में कुछ परिवर्तन लाने की परिवर्तित बर्तानी मंशा का लाभ अगर मुसलमानों को उठाना था तो उनके लिए संगठित होने की आवशयकता बन आई थी और उन्हें अब एक राजनातिक दल की स्थापना कर लेनी थी. मुसलमानों की इस मंशा से किसी ना किसी रूप में भारत में कांग्रेसियों  द्वारा किये जा रहे स्वाधीनता आन्दोलन में विभाजन कराने का एक अवसर अंग्रेजों को मिल चुका था. और ऐसा ही ढाका में दिसम्बर 1906 में  आगे चल कर हुआ जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई.

ढाका में मुस्लिम लीग के स्थापना के उपलक्ष में अपने अध्यक्षीय भाषण में मुश्ताक अहमद ने कहा, “ हमें  शुक्रगुजार होना चाहिए मरहूम सय्यद अहमद खान का जिन्होंने ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना उपरान्त मुसलमानों को इस  पार्टी से  अलग रहने की सलाह दी थी. उनका मानना था की मुसलमानों की जानोमाल की हिफाजत और बरक्कत इस पार्टी से अलग रहने में ही है.हमारी बेहतरी इसी बात में है की हम अंग्रेजों का दिल जीतें और उनके विशवास के पात्र  बने और बर्तानी हुकूमत को यह विशवास दिला दें की लम्बे अरसे तक इस मुल्क पर जो शासन करने का तजुर्बा हमारी कौम को हासिल है उसका बेहतर इस्तेमाल इस मुल्क में अंगरेजी शासन हमसे करा सकती है. हमें इस समझदारी से काम लेने की जरूरत है की किसी भी राजनीतिक अभिलाषा की पौध वफादारी की जमीन पर ही मुनासिब है और इस वजह से हमारा अंग्रेज़ी हुकूमत के प्रती वफादार रहने की जरूरत है, इसी में हमारी बेहतरी है. आज हम इस मुल्क का पांचवा हिस्सा हैं अगर कल अंग्रेज़ इस ज़मीन को छोड़ कर चले गए तो इस मुल्क की हुकूमत उनके हाथों में आ जायेगी जिनकी तादाद हमसे चार  गुना है. अब आप हाजरीन समझ सकते हैं की उस हुकूमत के तहत हमारी हालत क्या होगी. हमे औरंगजेब के किये का ज़िम्मेदार ठहराया जायेगा और जवाब मांगे जायेंगे उसकी किये के,  जिसने दो सदियों पूर्व इस मुल्क पर राज किया था . इसलिए हमारी बेहतरी इसी में है की हम बर्तानी हुकूमत के अन्दर संगठित हों ‘’.

 लार्ड कर्जन ने कलकत्ता में 1900  में भाषण में कहा था , “ भारत के किस भाग ने औरंगजेब की तबाहियां दर्ज नहीं कीं. जब हम बनारस में नदी किनारे मस्जिदों की गगनचुम्बी मीनारों की खूबसूरती का अवलोकन कर रहे होते हैं तब हममे से कितनों को ख्याल आता है की इन मीनारों को खड़ा करने के लिए किस तरह विश्वेश्वर के मंदिर की तबाही  की गयी और उस तबाही से इन मीनारों के लिए निर्माण सामग्री जुटाई गयी.


 ढाका में 1906  में बुलाये गए मुस्लिम अधिवेशन के एक वर्ष बाद  1907  में  वीर सावरकर की अगुआई में 1857 के ग़दर और प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 50वीं वर्षगाँठ पर हिन्दू मुस्लिम एकता की उस युद्ध में मिसाल देते हुए सावरकर हिन्दू- मुस्लिम एकता में बर्तानियों के खिलाफ हिंसक आन्दोलन  छेड़ने के पक्षधर दिखे. उनका मानना था की बर्तानी साम्राज्य की जड़ें हिंसक आन्दोलन के जरिये ही भारत से उखाड़ीं जा सकतीं हैं. वो अहिंसा को कायरता  मानते थे . उनके ये मत हिन्दू महासभा के 22 वें अधिवेशन में 1918 में प्रकट हुए. सावरकर के ही विचार बाद में  मुख्य रूप से उग्र हिन्दू विचारधारा और नाथूराम गोडसे के प्रेरणास्रोत बने. वीर सावरकर के नए विचार कालांतर में मुसलामानों के विचारों में हिन्दुओं के प्रती विरोधी मत की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं. ..........क्रमशः     

Thursday, 10 August 2017

Salok6226:                  1. गाँधी और देश का सच  वर्तमान पी...

Salok6226:                  1. गाँधी और देश का सच  वर्तमान पी...:                   1. गाँधी और देश का सच  वर्तमान पीढी को राष्ट्र की  गुलामी से स्वाधीनता तक की उसकी ऐतिहासिक यात्रा संबंधी जानकारियों ...

                                    2. बापू और कांग्रेस                                

मैं अक्सर बापू से पूछता हूँ , बापू ! आपने कांग्रेस को स्वतंत्रता उपरान्त भंग करने का परामर्श क्यों दिया ? बापू तो हैं नहीं पर उन्होंने जो दिव्य अलख जलाया था और जिसकी रोशनी में हमने अपनी स्वाधीनता संग्राम की यात्रा संपन्न की, वह अलख तो आज भी जागृत है और उसी के सहारे प्रश्नों के उत्तर ढूढने की चेष्टा करता हूँ. क्या कारण रहा होगा बापू के परामर्श का ? बापू के लिए सत्य मात्र एक शब्द नहीं था वह उनके आग्रह की बुनियाद थी जिस पर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की नीव रक्खी थी. कोई भी मनुष्य निश्चयता के साथ यह तो नहीं कह सकता की उसने किसी देव को सशरीर अवतरित होते देखा पर वह इतना जरूर स्वीकार करेगा की उसने कुछ मनुष्यों को देवत्व को प्राप्त होते जरूर देखा.

वाल्मीकि एक दस्यु था पर जब उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ तो उसने एक उत्तम चरित्र, राम की ही रचना कर डाली और हमें रामायण के दर्शन हुए. किन्ही दिव्य क्षणों में रामायण की रचना हो सकी होगी और यह दिव्यता वाल्मीकि के ह्रदय में ही अवतरित हुई होगी जब वे रामायण का सृजन कर सके होंगे. व्यास के भी ह्रदय में अवतरित दिव्यता का परिणाम गीता है जो बापू की प्रेरणास्रोत रही और उस महाकाव्य के श्रवन, मनन और निदिध्यासन से ही बापू के चिंतन और आचरण और उनके आग्रह को दिव्यता हासिल हो सकी. उनके अन्तः में अवतरित दिव्यता को ही नमन करते हुए माउंटबैटन  ने बापू को बुद्ध और ईसा के समकक्ष माना. बापू के लिए सत्य मात्र एक शब्द नहीं था वह नित्य था और पूर्ण था जिसे आज भी नकारा नहीं जा सकता. बापू वो देखने और समझने की दिव्यता रखते थे जो शायद उनके अनुयायी नहीं पा सकते थे और यदी ऐसा होता तो नेहरु फिर इंदिरा फिर राजीव फिर सोनिया फिर राहुल और प्रियंका तक ही कांग्रेस सीमित नहीं रह जाती.

अगर सिर्फ इतना ही नेतृत्व सामर्थ कांग्रेस में था तो कांग्रेस दरिद्र ही रही क्योंकि  उसने कांग्रेस की महानता को एक ख़ास परिवार के दायरे के बाहर ढूँढने की कोशिश नहीं की और इस तरह बापू ने जहां और जिनमें राष्ट्र की आत्मा ढूंढी थी उस आत्मा को ही कांग्रेस ने त्याग दिया और जब आत्मा ही शरीर से अलग हो गयी तो नश्वर शरीर को तो सड़ना ही था और उससे सड़ांध तो आनी शुरू होनी ही थी. अगर कांग्रेस प्रजातांत्रिक मूल्यों पर टिकी रहती तो उसका ऐसा हश्र नहीं होता. अगर कांग्रेस ने प्रजातांत्रिक मूल्यों का सम्मान किया होता तो आज कांग्रेस नेतृत्व शून्यता को प्राप्त नहीं होती उसके विपरीत नेतृत्व क्षमता के दृष्टिकोण से सामर्थवान होती. गांधी ने जिनमें देश की आत्मा को ढूंढा था वो आज भी देश के कामगारों और किसानों और देश के ग्रामों में स्थित आज़ादी के दशकों बाद भी सिसक रहा  है, जिनके सहयोग से देश ने स्वतंत्रता पायी, सरकारें बनी पर खुद जिनकी हालत बहुसंख्यक होने के बावजूद कभी ना सुधर सकी , देश दो धडों में बटा सा रह गया. एक गरीब बहुल , दूसरा अल्प पर धनी.

 हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ बापू नेतृत्व में संग्राम किया था, हम साम्राज्यवाद और राजतंत्र के खिलाफ थे पर स्वाधीनता प्राप्ती के उपरान्त भी हम राजतंत्र को त्याग नहीं सके और हमें इसकी झलक परिवारवाद में दिखती रही जो प्रजातंत्र की अवधारणाओं के विपरीत था. बापू इस आसन्न संकट को देख रहे थे, नेहरु, पटेल व अन्य उनके प्रिय थे पर बापू सत्य को नकारने वालों में से नहीं थे वरना उन्होंने कांग्रेस को आज़ादी उपरान्त भंग करने का परामर्श ही क्यों दिया होता. सत्य ऐसा प्रकाश है जिसका सामना करना और स्वीकारना बहुत ही कठिन है और सत्य से शाक्शात्कार वीर ही कर सकते थे और बापू एक ऐसे ही वीर थे. बापू ने काग्रेस को भंग करने का परामर्श क्यों दिया था उसके कारण देश के विभाजन और आज के कांग्रेस की दीन स्तिथि से साफ़ उजागर है.


अगर कांग्रेसी वास्तव में धर्म सहिष्णु रहे होते तो जिन्ना को नाराजगी का कारण नहीं मिलता और अगर कांग्रेस ने बापू के परामर्श को स्वीकारते हुए कांग्रेस को भंग  कर दिया होता तो कांग्रेस की स्वाधीनता संग्राम में किरदारी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहती और उसका हश्र वह नहीं होता जो नेहरु और शास्त्री के उपरान्त हुआ. कांग्रेसी चिंतन अब वह नहीं रहा जिसके कारण उसके इतिहास और भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास को एक  माना गया. यह गीता के प्रकाश में  मात्रभूमी के चरणों में समर्पित राष्ट्रभक्तों का कर्मसंयास था. सन्यासियों में करता का बोध नहीं होता, वे कर्तित्वाभिमान से ग्रसित नहीं होते, ना तो वे स्वस्तुती करते हैं और ना ही अपनी स्तुतीगान की अपेक्षा रखते हैं. निःस्वार्थ  लोकसेवा सन्यासियों का लक्ष और कर्म होते हैं  जो किसी भी निज स्वार्थ से जुड़े नहीं होते, पारिवारिक स्वार्थ तो दूर की बात. गांधी स्वार्थी संस्कृति के पक्षधर नहीं थे. उन्होंने अपने वर्तमान में ही भविष्य से मिल रहे संकेतों के प्रती संवेदनशीलता दिखाई थी और समय रहते कांग्रेस को उचित परामर्श दिया था पर शायद बापू ने अपने अनुयायिओं से कुछ अधिक ही अपेक्षा कर डाली थी, बाद की कांग्रेसी यात्रा स्वप्रमाणित है. वह परिवार से बाहर नहीं निकल सकी जो प्रजातंत्र के गाल पर तमाचा है. इस राष्ट्र के स्वार्थी नेताओं ने दो बार अपने नायकों के साथ धोखा किया. पहली बार गांधी के साथ और दूसरी बार लोकनायक जयप्रकाश के साथ.


  1932  में रहमत अली ने जब जिन्ना से पृथक पकिस्तान की बात की थी तो जिन्ना ने इसे बकवास माना क्योकी इस वक़्त तक वे खुद भी हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे, बाद में उनके मन में कांग्रेस के लिए जो कटुता उत्पन्न हो गयी वह कांग्रेस में चुनाव उपरान्त मुसलमानों को जिम्मेवारियों में शामिल ना करने की कुछ कांग्रेसी नेताओं की संकीर्ण हठधर्मिता के कारण हुई.


 बापू ने स्वाधीनता संग्राम में कांग्रेस की भूमिका को ऐतिहासिक माना था वो नहीं चाहते थे की कांग्रेस आज़ादी उपरान्त राष्ट्र से चुनाव में अपने मात्रभूमी के प्रति निभाये गए अपने कर्तव्यों का पारितोषिक मांगे, पर बापू के परामर्श को किसी ने नहीं माना. नतीजा आज सामने है. राष्ट्र ने राजतंत्र से छुटकारा पाया था उसने राजाओं और राजकुमारों को अस्वीकार किया था पर एक प्रजातंत्रीय व्यवस्था के होते हुए भी किसी ना किसी रूप में राजतन्त्र भारतीय राजनीतिक संस्कृति का भाग बना रह गया और राष्ट्र को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पडी. बापू सही मायने में एक सन्यासी थे, ना तो उनमें कर्ता का बोध था और ना ही कर्तित्वाभिमान, वे तो लोक हितार्थी थे, लोकसंग्रह उनका लक्ष था धनसंग्रह नहीं, जो बाद में हमने अपने नेताओं में देखा.



बापू शुद्ध रूप से हिदू थे, सनातनी थे और जीवों के एकात्मता के ज्ञाता, वे ब्रह्मज्ञानी थे, शुद्ध आत्मस्वरूप के ज्ञानी थे. बापू हिन्दू थे और चुकी ब्रह्मज्ञानी थे इसलिए छुआछूत, जाती ,धर्म और पंथों में भेदभाव का विरोध करते थे, उन्हें मनुष्य के धर्म और उसकी वस्तुता का शुद्ध बोध था, एक हिन्दू होने के नाते वो जानते थे की धर्म कालान्तर में विकसित हुए रीति रिवाज मात्र नहीं, वह तो मनुष्य की वस्तुता में निहित है जो उसे पशु से भिन्न बनाता है. अलग अलग पात्रों में रक्खे  जल के सामान सारे मनुष्य उनकी नज़रों में एक समान थे जिनके प्रति भेद भाव की दृष्टी रखना उचित नहीं था. बापू धार्मिक सहिष्णुता की उस परिभाषा के पक्षधर हो नहीं सकते थे जैसी परिभाषा प्रस्तुत कर कांग्रेस ने धर्मों के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर डाली. हिन्दू , अगर वे हिन्दू हैं तो वे स्वभाव से ही सहिष्णू हैं  पर राजनीतिक अदूरदर्शिता ने उन्हें भी कलंकित कर दिया. इतिहास के किस काल खंड में हिन्दुओं नें कभी भी किसी अन्य धर्मनुआयी पर आक्रमण किया था फिर उनमें अब यह प्रतिक्रया क्यों उत्पन्न हुई................. क्रमशः

Monday, 7 August 2017

Salok6226:                  1. गाँधी और देश का सच  वर्तमान पी...

Salok6226:                  1. गाँधी और देश का सच  वर्तमान पी...:                   1. गाँधी और देश का सच  वर्तमान पीढी को राष्ट्र की  गुलामी से स्वाधीनता तक की उसकी ऐतिहासिक यात्रा संबंधी जानकारियों ...
                 1. गाँधी और देश का सच
 वर्तमान पीढी को राष्ट्र की  गुलामी से स्वाधीनता तक की उसकी ऐतिहासिक यात्रा संबंधी जानकारियों का होना नितांत आवश्यक है . अजीब विडम्बना है इस राष्ट्र की. जिन व्यक्तित्वों की हम उनके जीवन काल में यश कीर्ती करते हैं, अपनी ही इच्छा से  जिन्हें हम ताज पहनाते हैं, जिनके दिवंगत होने पर जनसमुद्र का भाग बन उनकी दीर्घ स्मृति के लिए नारे लगाते हैं, उनकी स्मृति को सूरज और चाँद के अमृतत्व के साथ जोड़ते हैं, वर्षों बाद उन्ही को अपमानित कर रहे होते हैं. पर शायद दोष पीढ़ियों का नहीं,लाचारियाँ का हैं क्योंकि हमारी प्रतिक्रियाएं उन बातों पर आधारित होतीं हैं जो अक्सर तथ्यहीन होती हैं , मिथ्या का प्रवाह होतीं हैं जो हमें अपने साथ बहाए लिए जाती हैं और जिनके सत्यापन के न तो साधन हमारे पास होते हैं ना ही समय. वर्तमान पीढी ही राष्ट्र की धरोहर है. उनका राष्ट्र संबंधी तथ्यों का जानकार होना आवश्यक और महत्वपूर्ण है ताकी राष्ट्रीय इतिहास के प्रकाश में वह अपने वर्तमान का मूल्यांकन कर सकें और सार्थक मूल्यांकन पर भविष्य निर्माण की बुनियाद रख सकें.
 स्वाधीनता संग्राम के क्षणों में न तो आज की सूचना तकनीकें थीं और ना ही आवागमन के वो साधन जो वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व का कुछ ही क्षणों में, राष्ट्र और विश्व में कहीं और कभी भी,किसी से भी, संपर्क स्थापित करवा देतीं हैं. उस काल में जब 75 वर्ष पार हुआ वह वृद्ध एक लट्ठ के सहारे, अर्धनग्न, इस बटे बिखरे उपमहाद्वीप को लाख विरोध और विरोधियों के बीच एक सूत्र में जोड़ने और अखंड रखने का प्रयास कर रहा था, उस काल में इस उपमहाद्वीप पर गिने चुनों के ही पास रेडियो ता ट्रांजिस्टर थे और दूरभाष नगण्य स्थानों पर ही उपलब्ध थे चिट्ठियाँ कई दिनों के उपरान्त अपने गंतव्य तक पहुँच पाती थी,  ना उतनी  शाक्षर्ता थी ना ही  उतने शिक्षित, आकाश मार्ग तब आज की तरह  यात्रा के लिए सुलभ नहीं हो पाया था. इन परिस्थियों में भी उस वृद्ध ने देश की आत्मा को एक सूत्र से जोड़ दिया और देश आज़ाद हो सका.
वाइसराय माउंटबैटन ने कभी उल्लेख किया था की किस तरह बापू पुराने लिफाफों के पीछे के हिस्सों  को काटकर उनका उपयोग उनसे पत्राचार के लिए करते थे और किस तरह एक पेंसिल का उपयोग उस वक़्त तक करते थे जब तक वह इतनी छोटी ना पड़ जाए की उसका उपयोग करना संभव ना रह जाए. ऐसे बहुत से कतरनों को जिसपर गांधी के सन्देश अंकित थे, माउंटबैटन ने इंग्लैंड में अपने निजी संग्रहालय में अपने अंतिम दिनों तक मूल्यवान धरोहर स्वरुप संजोये रक्खा था जो आज भी वक़्त के साथ पीले पड़े, इंग्लैंड में उनके मृत्यु उपरान्त भी मौजूद हैं.
बापू जिस वक़्त दक्षिण अफ्रीका में वकालत करते थे उनकी सालाना आय लगभग पांच  हज़ार पौंड थी जो एक बहुत बड़ी राशी थी पर उससे प्राप्त खुशी उस पीड़ा से बड़ी नहीं थी जो देश की गुलामी ने उन्हें दी थी और सबकुछ त्याग कर स्वाधीनता संग्राम में शामिल होने की प्रेरणा दी. बापू एक ऐसे देशभक्त थे जिन्होंने भारत की आत्मा और उसकी वास्तविकताओं को समझने और देश की आत्मा को एक सूत्र से जोड़ने के लिए के लिए सदैव रेल के तीसरे दर्जे में देश के गरीबों के साथ ही यात्रा की, दलितों की झोपड़ियों में अपना डेरा डाला, देशवासियों को एक सूत्र से जोड़ने के लिए देश के भीतर सैकड़ों मीलों की यात्रा पैदल ही की . उन्ही उद्योगपतियों के विरुद्ध जो उनके आन्दोलन को आर्थिक सहयोग देते थे  पटेल जो खुद पूंजीवादी विचारधारा के समर्थक थे और जिनका नेहरु के साम्यवादी विचारधारा से विरोध था, के सहयोग से ,बिना झिझक कामगारों के पक्ष में उद्योगपतियों के विरुद्ध बारडोली सत्याग्रह किया.
 जब एक बार वाइसराय माउंट बैटन से मिलने गए तो साथ में उनका दिन का भोजन और पात्र भी थे. टिन की एक कटोरी, एक टेढ़ी मेढी टिन की ही थाली, एक टूटा हुआ चम्मच जिसकी पकड़ एक लकड़ी के टुकड़े से उन्होंने ही बनाया था. उनके भोजन में बकरी के दूध से जमाई गयी दही, नींबू का कोई सूप, दो चार खजूर और एक दो रोटियां थी. उन्होंने माउंटबैटन से आग्रह किया की वे बकरी के दूध की दही को चखें, माउंटबैटन ने कतराने की बहुत कोशिश की और कहा, “ मैंने कभी भी बकरी के दूध की दही नहीं खाई है”. बापू किस तरह अपना सत्याग्रह त्यागने वालों में से थे , उन्होंने तत्काल कहा,“ योर एक्सेलेंसी ! किसी भी तजुर्बे की पहली दफः होती है ”. माउंटबैटन को दही का स्वाद लेना पडा. वो गांधी से बहुत स्नेह करने लगे थे , ज्यादा देर तक उनके आग्रह को ठुकरा नहीं सके. वर्षों बाद उन्होंने एक मित्र से कहा की वैसी बद्स्वाद चीज उन्होंने शायद पहली बार खाई थी. माउंटबैटन बापू का बहुत सम्मान करते थे पर जहां तक उन्होंने  नेहरू और पटेल से देश के विभाजन आधारित स्वाधीनता संबंधी योजना के लिए सहयोग की अपेक्षा बना ली थी वहीं वे बापू की प्रतिक्रया के प्रती संशयालू ही रहे क्यों की बापू किसी भी कीमत पर देश के बटवारे को स्वीकारने को सहमत नहीं थे, जिसके लिए नेहरु और पटेल सामयिक विवशताओं के बीच तैयार हो चुके थे.

   आज़ादी के दशकों  बाद उसी माटी से जहां की उपज गांधी,पटेल और जिन्ना थे, एक सेनानी दिखा. युगों को शायद जिसका इंतज़ार था. इस देशभक्त की देशभक्ती गांधी, पटेल ,तिलक सरीखी ही दिखी. जिस तरह बापू अपने अंतिम दिनों में कांग्रेस से भिन्न और खिन्न दिखे,यह शख्स भी कुछ सामान मजबूरियों में घिरा दिखा .तिलक और गांधी के सामान उसके विचार भी गीता से प्रेरित दिखे. गांधी के स्वप्न और इसके स्वप्न एक से दिखे, विचार भी सामान. पर मिथ्या प्रचार किसी को नहीं बकश्ती, कोई नहीं बच सका, बापू नहीं, नेहरु नहीं, मिथ्या के प्रवाह में कल इतिहास का स्वरुप क्या होगा और आज के नेतृत्व की कल उस प्रवाह में कैसी छवी उभरेगी वह तो सुदूर भविष्य के ओट में ही कहीं छुपा है पर जरूरत है की हम बिना भेद भाव के सत्य को मिथ्या से अलग कर, दर्ज करते चलें ताकी भावी पीढ़ियों का सत्य से साक्षात्कार संभव हो सके और वे अपने भविष्य के मार्ग चुन सकें........................ क्रमशः 

Wednesday, 14 December 2016

Manmohan versus Modi



                   Manmohan versus Modi 
  
It has been a month since and now clearly it is a battle between eloquence and silence. It is a battle between two prime ministers with their given styles, one with  penchant for loud which becomes cacophonous, and the other given to the classic not very popular in consumption but an evergreen break as noise becomes irksome. It is the battle of the two unquestionably honest, one who has demonetized the currency and the other who had devalued it as finance minister of the country. Devaluation had worked but is demonetization going to bear favorable results is a question that needs to be answered given the shock that the fiscal architecture has received through it.
Is this a road to hell paved with good intentions as opined by the ex prime minister? Is cash that flows in the economy a singular factor constituting the parallel economy or are there other factors such as land, gold, gems real estate, the monies stacked in safe havens across the globe as also the nature of political funding that forms the edifice of corruption   constituting the major and lion’s share of what makes the parallel economy? Extremely large part of the business transactions in the economy is dealt in cash as also saved so and though at the micro level these are small, at the macro, this adds up to the unignorable share of the GDP which has clearly taken the beating to the extent of no less than forty percent, despite which the common man sportingly braves things for the Prime Minister in some sadistic relief as some rich come under the radar. Modi for them is their   commander against the rich who questionably or otherwise have authored their misery for decades since independence.  The irony as of now is that the poor continue to opt for a surgical intervention for the cancer which lies elsewhere.
 Modi is a man of action as Obama called him but it is the same president who called Manmohan his guru. Both the Prime ministers are men of best intentions genuinely worried with the precarious affairs of the state, one termed as given too much too serious consideration of the consequences of his government’s decisions to be termed paralytic in conduct and the other considered by the predecessor as impetuous.
 If Modi has succeeded in making his predecessor speak he has only helped the nation because what comes from ex prime minister in reaction to demonetization is something that Modi and his government would do well if they deem it their duty to explain things pointed by Manmohan to the common man who precariously clings hope in some distant future.
 Modi should have shown up in Parliament, if he has shied, he has left a breach in his fort which in time will become bigger and menace him together with the increasing number of fronts that he has opened in his hitherto exhausted tenure.
 The common man stands for Modi and promises to keep   queuing for the two thousand buck but as time passes he may see reason in joining chorus with the old and seasoned economist whose question presently may be lost to din of the troll but to quote him “ history would  treat me kindly “. And history, given his worries for the nation, perhaps would.