विभाजन से जुडा एक गोपनीय तथ्य
देश के विभाजन के कोई
बत्तीस वर्षों बाद माउंटबैटन का सामना समय से पीले पड़ गए एक अति गोपनीय दस्तावेज
से हो गया. वो बेचैन हो गए, काश समय रहते उन्हें इस तथ्य की जानकारी मिल गयी होती
तो वे भारत को टूटने से बचाया जा सकता था. दस्तावेज और उससे सम्बंधित वह काला प्लेट
जो दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे वे साफ़ तौर पर बता रहे थे की ये जानकारी एक ऐसे
व्यक्ती से सम्बंधित थी जो अगर उचित समय पर उपलब्ध हो जाती तो इतिहास का स्वरुप ही
भिन्न होता. तस्वीर और तथ्य बताते थे की जिस व्यक्ति के विषय में ये जानकारियाँ
थीं वह कोई और नहीं, जिन्ना थे और तपैदिक से ग्रसित उनकी हालत इतनी बिगड़ चुकी थी
की उनके पास जीवन के कुछ ही महीने शेष थे और अगर ये जानकारी माउंटबैटन के पास होती
तो वे भारत को स्वाधीनता देने की अपनी योजना को कुछ महीनों तक टाल देते और इस तरह
भारत को विभाजित होने से बचा पाते.
माउंटबैटन को यह जानकारी विचलित कर गयी.
विवशताओं के दायरे ने उन्हें भारत को तोड़ने पर मजबूर कर दिया था और उन्हें विवश
करने वाले मुख्य रूप से जिन्ना ही थे. माउंटबैटन अब विचलित ही हो सकते थे, उनका
मानना था की अगर उनके पास यह जानकारी रहती तो वे जिन्ना के गुजर जाने तक अपनी भारत
को स्वाधीनता देने सम्बन्धी योजना को कुछ काल के लिए टाल देते और बदली
परिस्तिथियों में भारत को विभाजन से बचा लेते. माउंटबैटन को भारत के विभाजन से मिली
पीड़ा और जिन्ना की हठधर्मिता को उनके उस बयान में महसूस किया जा सकता है जब
उन्होंने 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी शिकस्त और बांग्लादेश
की आज़ादी के बाद अपनी प्रतिक्रया में दिया जब उन्होंने कहा , “ मैंने जिन्ना से कहा था की उनका भिर्नियों से खोखला हुया
पाकिस्तान पचीस वर्ष भी पूरे नहीं कर सकेगा “. पाकिस्तान अपने चौबीसवें वर्ष में
ही टूट चुका था.
अप्रील १९४७ से बम्बई के
एक डॉ पटेल के दफ्तर में अति गोपनीय ढंग से लिफाफे में मुहरबंद ये तथ्य जिनकी
जानकारी बर्तानी खुफिया एजेंसियों को भी नहीं हो सकी थी , अगर माउंटबैटन, गाँधी ,
नेहरु और पटेल को मालूम होतीं तो शायद भारत विभाजित होने से बच सकता था पर इस तथ्य
की गोपनीयता बनी रह गयी और जिन्ना को उनका पकिस्तान उनके जीवन काल में मिल गया. डॉ
पटेल ने अपने पेशे के प्रती अपने धर्म का निर्वाह किया था . उन्होंने अपने पेशे की
मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया. उन्होंने जिन्ना के स्वास्थ की गोपनीयता बनाए रक्खी
. धर्म के उनके इस इस आग्रह ने देश की अखंडता को बने रहने से वंचित कर दिया पर
उन्हें इसके लिए शायद कुसूरवार ठहराया नहीं जा सकता.
माउंटबैटन के भारत आगमन
से नौ माह पूर्व जून १९४६ से जिन्ना का उपचार कर रहे डॉ पटेल के पास ये गंभीर और
ऐतिहासिक जानकारियाँ थीं,जिन्ना के फेफड़े गंभीर रूप से संक्रमित हो गए थे, उनका
जीवन संकट में पड़ चुका था और उनके जीवन के कुछ महीने शेष बचे थे और उनकी आयू भी अब
अपने सत्तरवें वर्ष में थी.
मई १९४६ में शिमला में जिन्ना गंभीर रूप से
ब्रोंकाइटिस से पीड़ित हो गए थे. द्वितीय विश्व युद्ध से कुछ पूर्व उन्होंने बर्लिन
में भी अपना उपचार कराया था, कुछ लाभ तो हुआ था पर जब वे कभी कभार भाषण देते तो
उसके बाद बुरी तरह से हांफ रहे होते. शिमला में जब उनकी हालत गंभीर रूप से बिगड़
गयी तो उनकी बहन फातिमा तत्काल उन्हें
अपने साथ ले बम्बई के लिए निकल पडीं पर रास्ते में ही जिन्ना की हालत गंभीर रूप से
बिगड़ गयी. उनकी बहन ने किसी तरह से बम्बई के डॉ पटेल से संपर्क स्थापित किया. डॉ पटेल बम्बई से बाहर ही किसी तरह रेल पर
सवार हो गए और जिन्ना के जांच उपरान्त कहा की उनकी हालत इतनी बिगड़ चुकी थी की वे
किसी भी हालत में बम्बई में रेल से उतर स्टेशन से बाहर तक की यात्रा जीवित अवस्था में
पूरी नहीं कर पाएंगे. नतीजतन,बम्बई स्टेशन पर जिन्ना का स्वागत करने पहुंची भीड़
इन्तजार करती रह गयी उन्हें भीड़ से बचाने के लिए बम्बई से बाहर ही एक स्टेशन पर
रेल से उतारा गया और डॉ पटेल अपने चिकित्सालय ले गए.
गहन जांच उपरान्त डॉ पटेल
ने अपने मित्र जिन्ना को बड़ी साफगोई के साथ वस्तुस्तिथि से अवगत करा दिया. उनकी
जीवनी शक्तियां जीर्णता को प्राप्त हो चुकी थीं और अब उनके और उनकी मौत के बीच एक
दौड़ थी, निश्चय के साथ यह नहीं कहा जा सकता था की इस दौड़ में कौन आगे निकलेगा.
उन्होंने जिन्ना को अपने सामान्य क्रिया कलापों में कटौती करने की सलाह दी पर
जिन्ना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई. उन्होंने ने अपने मित्र डॉ पटेल से कहा की
उनके क्रिया कलापों में इस ऐतिहासिक घडी में कटौती का कोई प्रश्न ही नहीं था. वे
अपने जंग को किसी भी हालत में तब तक त्यागने को तैयार नहीं थे जब तब खुद सुपुर्दे
ख़ाक न हो जाएँ . वो खुद को अपने कर्तव्यों से विचलित होने की इजाज़त देने को तैयार
नहीं थे , उनके लिए उनके मित्र के आराम का मशविरा कोई मायने नहीं रखता था. उन्हें
भय था की अगर उनके बिगड़ते स्वास्थ की जानकारी उनके विरोधियों को हो जाती तो पकिस्तान
की उनकी मांग पर इसका प्रतिकूल असर पड़ जाता. वो यह मानते थे की उनके विरोधी विभाजन
को उनकी मौत तक टाल जाते और फिर उनके मृत्यु के बाद पकिस्तान का बनना कठिन हो जाता
क्यों की मुस्लिम लीग में उनके नीचे के पायदान पर खड़ा नेतृत्व किसी न किसी कारण कांग्रेसी नेताओं, गांधी और माउंटबैटन की बातों
में आ जाता और इस तरह पकिस्तान बनने से रह जाता.
अब के बाद जिन्ना हर
हफ्ते सुईओं के सहारे अपने जीवन को कुछ दीर्घता प्रदान करने लगे . अपने डाक्टर मित्र
की हिदायत के बावजूद और भी अधिक क्रियाशील
हो गए, डॉ पटेल ने उनकी बीमारी की गोपनीयता बनाए रखी और माउंटबैटन पर पकिस्तान की
मांग और बढ़ गयी, अविभाजित बंगाल और पंजाब में इतिहास के सबसे बड़े और दुखद कत्लेआमों
का दौर शुरू हो गया ,अकेले बंगाल में ही २५००० जानें जा चुकीं थी , मरनेवालों में
हिन्दू और मुसलमान दोनों थे उधर पंजाब में भी कुछ इसी तरह कत्लेआम छिड़ा हुआ था, पंजाब और
बंगाल से आ रही ख़बरों ने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया था. महायुद्ध ने उनकी कमर
तोड़ डाली थी.एटली की सरकार जल्द से जल्द उपमहाद्वीप से अपने आप को वापस निकाल लेना
चाहती थी. एक शख्स था जो हारने को तैयार नहीं था. लाख व्यवधानों के बावजूद उसकी
मात्र मौजूदगी से दंगे रुक जाते थे. गांधी हिन्दू और मुसलमानों के बीच अमन का
सन्देश फैला रहे थे पर जिन्ना और उनके सहयोगी कुछ और चाह रहे थे , अगर बापू राष्ट्र
को अखंड रखने के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने में लीन थे जिन्ना सुइयों के सहारे
देश को तोड़ने पर अडिग थे. माउंटबैटन नेहरू और पटेल भी अब जिन्ना से ऊब चुके थे और
विभाजन को नियती मान स्वीकार कर चुके थे..................क्रमशः
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