2. बापू और कांग्रेस
मैं अक्सर बापू से पूछता
हूँ , बापू ! आपने कांग्रेस को स्वतंत्रता उपरान्त भंग करने का परामर्श क्यों दिया
? बापू तो हैं नहीं पर उन्होंने जो दिव्य अलख जलाया था और जिसकी रोशनी में हमने
अपनी स्वाधीनता संग्राम की यात्रा संपन्न
की, वह अलख तो आज भी जागृत है और उसी के सहारे प्रश्नों के उत्तर ढूढने की चेष्टा
करता हूँ. क्या कारण रहा होगा बापू के परामर्श का ? बापू के लिए सत्य मात्र एक
शब्द नहीं था वह उनके आग्रह की बुनियाद थी जिस पर उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की
नीव रक्खी थी. कोई भी मनुष्य निश्चयता के साथ यह तो नहीं कह सकता की उसने किसी देव
को सशरीर अवतरित होते देखा पर वह इतना जरूर स्वीकार करेगा की उसने कुछ मनुष्यों को
देवत्व को प्राप्त होते जरूर देखा.
वाल्मीकि एक दस्यु था पर
जब उसे अपनी भूल का ज्ञान हुआ तो उसने एक उत्तम चरित्र, राम की ही रचना कर डाली और
हमें रामायण के दर्शन हुए. किन्ही दिव्य क्षणों में रामायण की रचना हो सकी होगी और
यह दिव्यता वाल्मीकि के ह्रदय में ही अवतरित हुई होगी जब वे रामायण का सृजन कर सके
होंगे. व्यास के भी ह्रदय में अवतरित दिव्यता का परिणाम गीता है जो बापू की
प्रेरणास्रोत रही और उस महाकाव्य के श्रवन, मनन और निदिध्यासन से ही बापू के चिंतन
और आचरण और उनके आग्रह को दिव्यता हासिल हो सकी. उनके अन्तः में अवतरित दिव्यता को
ही नमन करते हुए माउंटबैटन ने बापू को
बुद्ध और ईसा के समकक्ष माना. बापू के लिए सत्य मात्र एक शब्द नहीं था वह नित्य था
और पूर्ण था जिसे आज भी नकारा नहीं जा सकता. बापू वो देखने और समझने की दिव्यता
रखते थे जो शायद उनके अनुयायी नहीं पा सकते थे और यदी ऐसा होता तो नेहरु फिर इंदिरा
फिर राजीव फिर सोनिया फिर राहुल और प्रियंका तक ही कांग्रेस सीमित नहीं रह जाती.
अगर सिर्फ इतना ही नेतृत्व सामर्थ कांग्रेस में था तो कांग्रेस
दरिद्र ही रही क्योंकि उसने कांग्रेस की
महानता को एक ख़ास परिवार के दायरे के बाहर ढूँढने की कोशिश नहीं की और इस तरह बापू
ने जहां और जिनमें राष्ट्र की आत्मा ढूंढी थी उस आत्मा को ही कांग्रेस ने त्याग
दिया और जब आत्मा ही शरीर से अलग हो गयी तो नश्वर शरीर को तो सड़ना ही था और उससे
सड़ांध तो आनी शुरू होनी ही थी. अगर कांग्रेस प्रजातांत्रिक मूल्यों पर टिकी रहती
तो उसका ऐसा हश्र नहीं होता. अगर कांग्रेस ने प्रजातांत्रिक मूल्यों का सम्मान
किया होता तो आज कांग्रेस नेतृत्व शून्यता को प्राप्त नहीं होती उसके विपरीत नेतृत्व
क्षमता के दृष्टिकोण से सामर्थवान होती. गांधी ने जिनमें देश की आत्मा को ढूंढा था
वो आज भी देश के कामगारों और किसानों और देश के ग्रामों में स्थित आज़ादी के दशकों
बाद भी सिसक रहा है, जिनके सहयोग से देश
ने स्वतंत्रता पायी, सरकारें बनी पर खुद जिनकी हालत बहुसंख्यक होने के बावजूद कभी
ना सुधर सकी , देश दो धडों में बटा सा रह गया. एक गरीब बहुल , दूसरा अल्प पर धनी.
हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ बापू नेतृत्व
में संग्राम किया था, हम साम्राज्यवाद और राजतंत्र के खिलाफ थे पर स्वाधीनता
प्राप्ती के उपरान्त भी हम राजतंत्र को त्याग नहीं सके और हमें इसकी झलक परिवारवाद
में दिखती रही जो प्रजातंत्र की अवधारणाओं के विपरीत था. बापू इस आसन्न संकट को देख
रहे थे, नेहरु, पटेल व अन्य उनके प्रिय थे पर बापू सत्य को नकारने वालों में से
नहीं थे वरना उन्होंने कांग्रेस को आज़ादी उपरान्त भंग करने का परामर्श ही क्यों
दिया होता. सत्य ऐसा प्रकाश है जिसका सामना करना और स्वीकारना बहुत ही कठिन है और
सत्य से शाक्शात्कार वीर ही कर सकते थे और बापू एक ऐसे ही वीर थे. बापू ने काग्रेस
को भंग करने का परामर्श क्यों दिया था उसके कारण देश के विभाजन और आज के कांग्रेस की
दीन स्तिथि से साफ़ उजागर है.
अगर कांग्रेसी वास्तव में
धर्म सहिष्णु रहे होते तो जिन्ना को नाराजगी का कारण नहीं मिलता और अगर कांग्रेस
ने बापू के परामर्श को स्वीकारते हुए कांग्रेस को भंग कर दिया होता तो कांग्रेस की स्वाधीनता संग्राम
में किरदारी स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहती और उसका हश्र वह नहीं होता जो नेहरु और
शास्त्री के उपरान्त हुआ. कांग्रेसी चिंतन अब वह नहीं रहा जिसके कारण उसके इतिहास
और भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन के इतिहास को एक माना गया. यह गीता के प्रकाश में मात्रभूमी के चरणों में समर्पित राष्ट्रभक्तों
का कर्मसंयास था. सन्यासियों में करता का बोध नहीं होता, वे कर्तित्वाभिमान से
ग्रसित नहीं होते, ना तो वे स्वस्तुती करते हैं और ना ही अपनी स्तुतीगान की
अपेक्षा रखते हैं. निःस्वार्थ लोकसेवा
सन्यासियों का लक्ष और कर्म होते हैं जो
किसी भी निज स्वार्थ से जुड़े नहीं होते, पारिवारिक स्वार्थ तो दूर की बात. गांधी
स्वार्थी संस्कृति के पक्षधर नहीं थे. उन्होंने अपने वर्तमान में ही भविष्य से मिल
रहे संकेतों के प्रती संवेदनशीलता दिखाई थी और समय रहते कांग्रेस को उचित परामर्श
दिया था पर शायद बापू ने अपने अनुयायिओं से कुछ अधिक ही अपेक्षा कर डाली थी, बाद
की कांग्रेसी यात्रा स्वप्रमाणित है. वह परिवार से बाहर नहीं निकल सकी जो
प्रजातंत्र के गाल पर तमाचा है. इस राष्ट्र के स्वार्थी नेताओं ने दो बार अपने
नायकों के साथ धोखा किया. पहली बार गांधी के साथ और दूसरी बार लोकनायक जयप्रकाश के
साथ.
1932 में
रहमत अली ने जब जिन्ना से पृथक पकिस्तान की बात की थी तो जिन्ना ने इसे बकवास माना
क्योकी इस वक़्त तक वे खुद भी हिन्दू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे, बाद में उनके मन
में कांग्रेस के लिए जो कटुता उत्पन्न हो गयी वह कांग्रेस में चुनाव उपरान्त
मुसलमानों को जिम्मेवारियों में शामिल ना करने की कुछ कांग्रेसी नेताओं की संकीर्ण
हठधर्मिता के कारण हुई.
बापू ने स्वाधीनता संग्राम में कांग्रेस की
भूमिका को ऐतिहासिक माना था वो नहीं चाहते थे की कांग्रेस आज़ादी उपरान्त राष्ट्र
से चुनाव में अपने मात्रभूमी के प्रति निभाये गए अपने कर्तव्यों का पारितोषिक
मांगे, पर बापू के परामर्श को किसी ने नहीं माना. नतीजा आज सामने है. राष्ट्र ने
राजतंत्र से छुटकारा पाया था उसने राजाओं और राजकुमारों को अस्वीकार किया था पर एक
प्रजातंत्रीय व्यवस्था के होते हुए भी किसी ना किसी रूप में राजतन्त्र भारतीय
राजनीतिक संस्कृति का भाग बना रह गया और राष्ट्र को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी
पडी. बापू सही मायने में एक सन्यासी थे, ना तो उनमें कर्ता का बोध था और ना ही
कर्तित्वाभिमान, वे तो लोक हितार्थी थे, लोकसंग्रह उनका लक्ष था धनसंग्रह नहीं, जो
बाद में हमने अपने नेताओं में देखा.
बापू शुद्ध रूप से हिदू
थे, सनातनी थे और जीवों के एकात्मता के ज्ञाता, वे
ब्रह्मज्ञानी थे, शुद्ध आत्मस्वरूप के ज्ञानी थे. बापू हिन्दू थे और चुकी
ब्रह्मज्ञानी थे इसलिए छुआछूत, जाती ,धर्म और पंथों में भेदभाव का विरोध करते थे,
उन्हें मनुष्य के धर्म और उसकी वस्तुता का शुद्ध बोध था, एक हिन्दू होने के नाते
वो जानते थे की धर्म कालान्तर में विकसित हुए रीति रिवाज मात्र नहीं, वह तो मनुष्य
की वस्तुता में निहित है जो उसे पशु से भिन्न बनाता है. अलग अलग पात्रों में रक्खे
जल के सामान सारे मनुष्य उनकी नज़रों में
एक समान थे जिनके प्रति भेद भाव की दृष्टी रखना उचित नहीं था. बापू धार्मिक सहिष्णुता
की उस परिभाषा के पक्षधर हो नहीं सकते थे जैसी परिभाषा प्रस्तुत कर कांग्रेस ने
धर्मों के बीच टकराव की स्थिति पैदा कर डाली. हिन्दू , अगर वे हिन्दू हैं तो वे स्वभाव से ही सहिष्णू
हैं पर राजनीतिक अदूरदर्शिता ने उन्हें भी
कलंकित कर दिया. इतिहास के किस काल खंड में हिन्दुओं नें कभी भी किसी अन्य
धर्मनुआयी पर आक्रमण किया था फिर उनमें अब यह प्रतिक्रया क्यों उत्पन्न हुई.................
क्रमशः
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