Friday, 11 August 2017



                   3. मुस्लिम लीग और विभाजन

भारतीय रास्ट्रीय कांग्रेस स्थापना ने तत्काल ही मुसलमानों में प्रतिक्रिया उत्पन्न कर दी. सर सय्यद अहमद खान जो पेशे से एक न्यायधीश थे और जिन्होंने 1875 में, अलीगढ में मुहम्मदन एंग्लो ओरिएण्टल कालेज की स्थापना की थी, कांग्रेस को एक शिक्षित हिन्दुओं की पार्टी मानते थे जिसपर वो हिन्दुओं की वर्चस्वता   देखते  थे. मुसलमान हिन्दुओं की तुलना में अंगरेजी शिक्षा पाने में पिछड़े हुए थे और इस कारण वे कांग्रेस में खुद को अलग थलग महसूस करते थे. सर सय्यद अहमद मुसलमान को एक अलग कौम मानते थे जिनकी अपनी पहचान और रुचियाँ थीं और उनका मानना था की  अंग्रेजों से बेहतर सम्बन्ध कायम कर मुसलमान बेहतर लाभ उठा सकते थे. उनकी समझ से कांग्रेस में रहना मुसलमानों के लिए घाटे का सौदा था.यह पहली बार था की सय्यद अहमद की जुबान से हिन्दुस्तान में  मुसलामानों की कौम की दृष्टी से अलग होने की बात साफ शब्दों में प्रकट हुई . और शायद यही वो चिंगारी थी जिसे हिन्दू भावनाओं को धीरे धीरे भड़काना था.

मद्रास में बुलाये गए एक कांग्रेसी सभा में मुसलमान नवाबों और रईसों और बदरुद्दीन की कांग्रेसियों के बीच मौजूदगी से नाराज़ सर सय्यद अहमद खान ने मेरठ में मार्च 1888 में एक बहुत ही भड़काऊ भाषण दिया, उनके  भाषण  में हिन्दुओं के प्रती एक नफरत भरे संशय की झलक थी. उन्होंने अशिक्षित मुसलमानों का बर्तानी शासन के अधीन रहना किसी भी हिन्दू बहुल शासन व्यवस्था  के अधीन रहने से बेहतर माना तब तक, जबतक मुसलमान अपनी शिक्षा के स्तर को हिदुओं के समकक्ष नही ले आ पाते. वे मुसलमानों को एक अलग कौम मानते थे जिसने 700 वर्षों तक इस हिन्दू बहुल राष्ट्र को अपने अधीन रखा था. उनकी समझ में अंग्रेज जो किसी दृष्टीकोन से एक ही किताब के मुसलमानों के भाई थे, उनके शासन में रहना मुसलमानों के लिए हिन्दू बहुल किसी भी व्यवस्था के अधीन रहने से कहीं अधिक सम्मानजनक था. वे मुसलामानों को अंग्रेजों के साथ बेहतर संबंधों की स्थापना की बात कर रहे थे और कांग्रेसियों की अंग्रेज शासकों से देश की शासन व्यवस्था में भारतीय प्रतिनिधित्व की मांग  का कट्टर विरोध कर रहे थे . उनका कहना था की किसी भी हारी हुई कौम का विजयी कौम से किसी भी तरह के प्रतिनिधित्व की अपेक्षा करना एक जुल्म था और इस तरह वह कांग्रेसियों के बर्तानी शासन में किसी भी तरह की भागीदारी की मांग को सिरे से खारिज कर रहे थे .हिन्दू बहुल व्यवस्था का भाग या उसके अधीन रहने से बेहतर वो ऐसे बर्तानी शासन के पक्षधर थे, जिसका भले ही कभी भी अंत न हो और भले ही वह हमेशा के लिए इस राष्ट्र पर काबिज रहे.

अक्टूबर 1906 , देश के 35 धनी मुसलमानों ने वाइसराय लार्ड मिन्टो से मिलकर मुसलमानों की हित की बातें कीं. उन्होंने बर्तानी सरकार से हिन्दु बहुमत के तथाकथित असहिष्णु व्यवहार के खिलाफ मदद मांगी. लार्ड मिनटों  ने उनका स्वागत किया और आश्वासन दिया की बर्तानी सरकार हर हालत में मुसलमानों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करेगी. चुंकि बर्तानी सरकार भारतियों को शासन में  थोड़ी बहुत भागीदारी देने का मन बना चुकी थी इसलिए इस प्रतिनिधीमंडल ने इस वक़्त मिन्टो से मिलना अनुकूल समझा और इस तरह मुसलमानों का कांग्रेसी विरोधी रवैया अब स्पष्ट होने लगा था वे ऐसा मानने लगे थे की कांग्रेस के दबाव में लोकशासन और व्यवस्था में कुछ परिवर्तन लाने की परिवर्तित बर्तानी मंशा का लाभ अगर मुसलमानों को उठाना था तो उनके लिए संगठित होने की आवशयकता बन आई थी और उन्हें अब एक राजनातिक दल की स्थापना कर लेनी थी. मुसलमानों की इस मंशा से किसी ना किसी रूप में भारत में कांग्रेसियों  द्वारा किये जा रहे स्वाधीनता आन्दोलन में विभाजन कराने का एक अवसर अंग्रेजों को मिल चुका था. और ऐसा ही ढाका में दिसम्बर 1906 में  आगे चल कर हुआ जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई.

ढाका में मुस्लिम लीग के स्थापना के उपलक्ष में अपने अध्यक्षीय भाषण में मुश्ताक अहमद ने कहा, “ हमें  शुक्रगुजार होना चाहिए मरहूम सय्यद अहमद खान का जिन्होंने ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना उपरान्त मुसलमानों को इस  पार्टी से  अलग रहने की सलाह दी थी. उनका मानना था की मुसलमानों की जानोमाल की हिफाजत और बरक्कत इस पार्टी से अलग रहने में ही है.हमारी बेहतरी इसी बात में है की हम अंग्रेजों का दिल जीतें और उनके विशवास के पात्र  बने और बर्तानी हुकूमत को यह विशवास दिला दें की लम्बे अरसे तक इस मुल्क पर जो शासन करने का तजुर्बा हमारी कौम को हासिल है उसका बेहतर इस्तेमाल इस मुल्क में अंगरेजी शासन हमसे करा सकती है. हमें इस समझदारी से काम लेने की जरूरत है की किसी भी राजनीतिक अभिलाषा की पौध वफादारी की जमीन पर ही मुनासिब है और इस वजह से हमारा अंग्रेज़ी हुकूमत के प्रती वफादार रहने की जरूरत है, इसी में हमारी बेहतरी है. आज हम इस मुल्क का पांचवा हिस्सा हैं अगर कल अंग्रेज़ इस ज़मीन को छोड़ कर चले गए तो इस मुल्क की हुकूमत उनके हाथों में आ जायेगी जिनकी तादाद हमसे चार  गुना है. अब आप हाजरीन समझ सकते हैं की उस हुकूमत के तहत हमारी हालत क्या होगी. हमे औरंगजेब के किये का ज़िम्मेदार ठहराया जायेगा और जवाब मांगे जायेंगे उसकी किये के,  जिसने दो सदियों पूर्व इस मुल्क पर राज किया था . इसलिए हमारी बेहतरी इसी में है की हम बर्तानी हुकूमत के अन्दर संगठित हों ‘’.

 लार्ड कर्जन ने कलकत्ता में 1900  में भाषण में कहा था , “ भारत के किस भाग ने औरंगजेब की तबाहियां दर्ज नहीं कीं. जब हम बनारस में नदी किनारे मस्जिदों की गगनचुम्बी मीनारों की खूबसूरती का अवलोकन कर रहे होते हैं तब हममे से कितनों को ख्याल आता है की इन मीनारों को खड़ा करने के लिए किस तरह विश्वेश्वर के मंदिर की तबाही  की गयी और उस तबाही से इन मीनारों के लिए निर्माण सामग्री जुटाई गयी.


 ढाका में 1906  में बुलाये गए मुस्लिम अधिवेशन के एक वर्ष बाद  1907  में  वीर सावरकर की अगुआई में 1857 के ग़दर और प्रथम स्वाधीनता संग्राम की 50वीं वर्षगाँठ पर हिन्दू मुस्लिम एकता की उस युद्ध में मिसाल देते हुए सावरकर हिन्दू- मुस्लिम एकता में बर्तानियों के खिलाफ हिंसक आन्दोलन  छेड़ने के पक्षधर दिखे. उनका मानना था की बर्तानी साम्राज्य की जड़ें हिंसक आन्दोलन के जरिये ही भारत से उखाड़ीं जा सकतीं हैं. वो अहिंसा को कायरता  मानते थे . उनके ये मत हिन्दू महासभा के 22 वें अधिवेशन में 1918 में प्रकट हुए. सावरकर के ही विचार बाद में  मुख्य रूप से उग्र हिन्दू विचारधारा और नाथूराम गोडसे के प्रेरणास्रोत बने. वीर सावरकर के नए विचार कालांतर में मुसलामानों के विचारों में हिन्दुओं के प्रती विरोधी मत की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं. ..........क्रमशः     

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