1. गाँधी और देश का सच
वर्तमान पीढी को राष्ट्र की गुलामी से स्वाधीनता तक की उसकी ऐतिहासिक
यात्रा संबंधी जानकारियों का
होना नितांत आवश्यक है . अजीब विडम्बना है इस राष्ट्र की. जिन व्यक्तित्वों की
हम उनके जीवन काल में यश कीर्ती करते हैं, अपनी ही इच्छा
से जिन्हें हम ताज पहनाते हैं, जिनके
दिवंगत होने पर जनसमुद्र का भाग बन उनकी दीर्घ स्मृति के लिए नारे लगाते हैं, उनकी
स्मृति को सूरज और चाँद के अमृतत्व के साथ जोड़ते हैं, वर्षों बाद उन्ही को अपमानित कर रहे होते हैं. पर शायद दोष
पीढ़ियों का नहीं,लाचारियाँ का हैं क्योंकि हमारी प्रतिक्रियाएं उन बातों पर आधारित
होतीं हैं जो अक्सर तथ्यहीन होती हैं , मिथ्या का
प्रवाह होतीं हैं जो हमें अपने साथ बहाए लिए जाती हैं और जिनके सत्यापन के न तो साधन
हमारे पास होते हैं ना ही समय. वर्तमान पीढी ही राष्ट्र की धरोहर है. उनका राष्ट्र
संबंधी तथ्यों का जानकार होना आवश्यक और महत्वपूर्ण है ताकी राष्ट्रीय इतिहास के
प्रकाश में वह अपने वर्तमान का मूल्यांकन कर सकें और सार्थक मूल्यांकन पर भविष्य
निर्माण की बुनियाद रख सकें.
स्वाधीनता संग्राम के क्षणों में न तो आज की
सूचना तकनीकें थीं और ना ही आवागमन के वो साधन जो वर्तमान राष्ट्रीय नेतृत्व का
कुछ ही क्षणों में, राष्ट्र और विश्व में कहीं और कभी भी,किसी से भी, संपर्क
स्थापित करवा देतीं हैं. उस काल में जब 75 वर्ष पार हुआ वह वृद्ध एक लट्ठ के
सहारे, अर्धनग्न, इस बटे बिखरे उपमहाद्वीप को लाख विरोध और विरोधियों के बीच एक
सूत्र में जोड़ने और अखंड रखने का प्रयास कर रहा था, उस काल में इस उपमहाद्वीप पर
गिने चुनों के ही पास रेडियो ता ट्रांजिस्टर थे और दूरभाष नगण्य स्थानों पर ही
उपलब्ध थे चिट्ठियाँ कई दिनों के उपरान्त अपने गंतव्य तक पहुँच पाती थी, ना उतनी शाक्षर्ता थी ना ही उतने शिक्षित, आकाश मार्ग तब आज की तरह यात्रा के लिए सुलभ नहीं हो पाया था. इन
परिस्थियों में भी उस वृद्ध ने देश की आत्मा को एक सूत्र से जोड़ दिया और देश आज़ाद
हो सका.
वाइसराय माउंटबैटन ने कभी
उल्लेख किया था की किस तरह बापू पुराने लिफाफों के पीछे के हिस्सों को काटकर उनका उपयोग उनसे पत्राचार के लिए करते
थे और किस तरह एक पेंसिल का उपयोग उस वक़्त तक करते थे जब तक वह इतनी छोटी ना पड़
जाए की उसका उपयोग करना संभव ना रह जाए. ऐसे बहुत से कतरनों को जिसपर गांधी के
सन्देश अंकित थे, माउंटबैटन ने इंग्लैंड में अपने निजी संग्रहालय में अपने अंतिम
दिनों तक मूल्यवान धरोहर स्वरुप संजोये रक्खा था जो आज भी वक़्त के साथ पीले पड़े,
इंग्लैंड में उनके मृत्यु उपरान्त भी मौजूद हैं.
बापू जिस वक़्त दक्षिण
अफ्रीका में वकालत करते थे उनकी सालाना आय लगभग पांच हज़ार पौंड थी जो एक बहुत बड़ी राशी थी पर उससे
प्राप्त खुशी उस पीड़ा से बड़ी नहीं थी जो देश की गुलामी ने उन्हें दी थी और सबकुछ
त्याग कर स्वाधीनता संग्राम में शामिल होने की प्रेरणा दी. बापू एक ऐसे देशभक्त थे
जिन्होंने भारत की आत्मा और उसकी वास्तविकताओं को समझने और देश की आत्मा को एक
सूत्र से जोड़ने के लिए के लिए सदैव रेल के तीसरे दर्जे में देश के गरीबों के साथ
ही यात्रा की, दलितों की झोपड़ियों में अपना डेरा डाला, देशवासियों को एक सूत्र से
जोड़ने के लिए देश के भीतर सैकड़ों मीलों की यात्रा पैदल ही की . उन्ही उद्योगपतियों
के विरुद्ध जो उनके आन्दोलन को आर्थिक सहयोग देते थे पटेल जो खुद पूंजीवादी विचारधारा के समर्थक थे
और जिनका नेहरु के साम्यवादी विचारधारा से विरोध था, के सहयोग से ,बिना झिझक कामगारों
के पक्ष में उद्योगपतियों के विरुद्ध बारडोली सत्याग्रह किया.
जब एक बार वाइसराय माउंट बैटन से मिलने गए तो
साथ में उनका दिन का भोजन और पात्र भी थे. टिन की एक कटोरी, एक टेढ़ी मेढी टिन की
ही थाली, एक टूटा हुआ चम्मच जिसकी पकड़ एक लकड़ी के टुकड़े से उन्होंने ही बनाया था. उनके
भोजन में बकरी के दूध से जमाई गयी दही, नींबू का कोई सूप, दो चार खजूर और एक दो
रोटियां थी. उन्होंने माउंटबैटन से आग्रह किया की वे बकरी के दूध की दही को चखें,
माउंटबैटन ने कतराने की बहुत कोशिश की और कहा, “ मैंने कभी भी बकरी के दूध की दही
नहीं खाई है”. बापू किस तरह अपना सत्याग्रह त्यागने वालों में से थे , उन्होंने तत्काल
कहा,“ योर एक्सेलेंसी ! किसी भी तजुर्बे की पहली दफः होती है ”. माउंटबैटन को दही
का स्वाद लेना पडा. वो गांधी से बहुत स्नेह करने लगे थे , ज्यादा देर तक उनके
आग्रह को ठुकरा नहीं सके. वर्षों बाद उन्होंने एक मित्र से कहा की वैसी बद्स्वाद
चीज उन्होंने शायद पहली बार खाई थी. माउंटबैटन बापू का बहुत सम्मान करते थे पर
जहां तक उन्होंने नेहरू और पटेल से देश के
विभाजन आधारित स्वाधीनता संबंधी योजना के लिए सहयोग की अपेक्षा बना ली थी वहीं वे बापू
की प्रतिक्रया के प्रती संशयालू ही रहे क्यों की बापू किसी भी कीमत पर देश के बटवारे
को स्वीकारने को सहमत नहीं थे, जिसके लिए नेहरु और पटेल सामयिक विवशताओं के बीच
तैयार हो चुके थे.
आज़ादी
के दशकों बाद उसी माटी से जहां की उपज
गांधी,पटेल और जिन्ना थे, एक सेनानी दिखा. युगों को शायद जिसका इंतज़ार था. इस
देशभक्त की देशभक्ती गांधी, पटेल ,तिलक सरीखी ही दिखी. जिस तरह बापू अपने अंतिम
दिनों में कांग्रेस से भिन्न और खिन्न दिखे,यह शख्स भी कुछ सामान मजबूरियों में
घिरा दिखा .तिलक और गांधी के सामान उसके विचार भी गीता से प्रेरित दिखे. गांधी के
स्वप्न और इसके स्वप्न एक से दिखे, विचार भी सामान. पर मिथ्या प्रचार किसी को नहीं
बकश्ती, कोई नहीं बच सका, बापू नहीं, नेहरु नहीं, मिथ्या के प्रवाह में कल इतिहास
का स्वरुप क्या होगा और आज के नेतृत्व की कल उस प्रवाह में कैसी छवी उभरेगी वह तो
सुदूर भविष्य के ओट में ही कहीं छुपा है पर जरूरत है की हम बिना भेद भाव के सत्य
को मिथ्या से अलग कर, दर्ज करते चलें ताकी भावी पीढ़ियों का सत्य से साक्षात्कार
संभव हो सके और वे अपने भविष्य के मार्ग चुन सकें........................ क्रमशः
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