कलम का सिपाही
“संपादक जी आज कुछ ज्यादा
ही हो गया “, व्यवस्थापक ने कहा .जवाब मिला हमने तो सिर्फ ऊपर के उतारे हैं नीचे
के तो नहीं . और इस तरह ठहाकों के बीच बात आई गयी हो गयी . वह अस्सी का दशक था
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नई परिभाषा ढूंढ
रही थी चैनल उतने आम नहीं हुए थे , एक चैनल था जो शाम के वक़्त दूरदर्शन के अलावा
वजूद में था . हाँ अभी चैनलों का परचूनिया
दुकाने बन्ने का दौर दूर था . अभी माल्या सरीखे लोगों को देश की बेटियों से अपने कैलेंडरों
में नग्नता बिखेरवाना बाकी था पर हाँ अब मर्यादा के दायरे टूटने ही वाले थे. कलम के सिपाहियों को अब पीछे
की पंती में जाना था और पतलून कोट पहने लौन्डों को पत्रकारिता को अपनी खोखली मुंड और
मचलती जुबान की लौंडिया बनाना था . मर्यादा को खंड खंड करना था . भूल जाना था
लोकमत और लोक मैंडेट के फर्क को , भावनाओं के झंझावात और विवेकशीलता के फर्क को . जिसने मत भिन्नता
प्रकट कर डाली उसे देशद्रोही करार दे देना था . इन्हें ही क्रिकेट का कप्तान ,
विदेशनीति के निर्णायक , सेना की रणनीति के नियामक और सरकार भी बन जाना था भूल
सिर्फ इतना जाना था की पत्रकारिता सबेरे से शाम किसी एक मुद्दे को पकड़ किसी
सुनिश्चित दिशा की ओर मुंह कर भौंकते जाने का नाम नहीं . पत्रकारिता जबतक शालीनता
के दायरे में रही कलम के सिपाहियों का सम्मान बना रहा . एक नाराज पत्रकार के
यहाँ मुख्य मंत्रियों को भी जाना पड़ जाता
था ,वह पत्रकार जिसके कलम और कागज़ के बीच किसी कमर्शियल ब्रेक की जरूरत नहीं पड़ती थी वह
ना तो किसी के मुंह में माइक और नाही शब्द घुसेड़ता था हाँ पर जब और जहां जहाँ वह
अपने दिमाग और कलम को घुसेड़ता था वहां वहां से व्यवस्था की कराह निकल जाया करती थी
. पब्लिक को पेश किये जाने वाले किसी साक्षात्कार से पहले रिहर्सल की जरूरत नहीं
पड़ती थी, जो अब आम है . सरकार और उसके इदारे कलम
की जुबान को संजीदगी से नोट करते थे और अपने आचरण में लोक भावनाओं के प्रति समर्पण के लिए विवश हो पाते थे . देश का प्रधान मंत्री काबिल
है , सरकार में काबिलता है, सैनिक सरहद पर तैनात , उनकी गोलियों और हमारे बीच ढाल
बने खड़े है . नौरात्र है , सैनिक बिना
आरक्षण रेलगाड़ियों से सरहद की ओर कूच कर रहे है . माताएं और बहने भाइयों और बेटों को विदा कर रही हैं , हम पंडालों में
बैठे नवरात्र मना रहे हैं इन नौ रातों में हमारे सैनिक सरहदों की निगरानी कर रहे
हैं . ध्यान उधर ही लगा है और पूरी तरह लगा है सरकार और तमाम देशवासियों का . सब जाग रहे हैं , कुत्ते भी जाग
रहे हैं , कुत्तों की भी अहमियत है , सावधान करते हैं पर हर वक़्त भौंके , और बिला
वजह भौकें , तो खलल पहुँचता है .
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